
सार
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 2028 विधानसभा चुनाव से पहले ‘जनविश्वास अभियान’ के जरिए उन क्षेत्रों में सीधे जनता से संवाद शुरू किया है, जहां 2023 के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन भाजपा से बेहतर रहा था। छिंदवाड़ा से शुरू हुआ अभियान अब बड़वानी, टीकमगढ़ के बाद बालाघाट की ओर बढ़ रहा है। इन चार जिलों की 20 विधानसभा सीटों में 2023 के नतीजों के बाद कांग्रेस के पास 15 सीटें हैं, जबकि भाजपा के पास पांच सीटें हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री का सीधा जनसंपर्क भाजपा के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विस्तार
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 7 अगस्त 2026 को छिंदवाड़ा से जनविश्वास अभियान की शुरुआत की थी। इसके बाद अभियान बड़वानी और टीकमगढ़ पहुंचा और अब बालाघाट में मुख्यमंत्री जनता से संवाद करेंगे। खास बात यह है कि अभियान के लिए चुने गए ये जिले ऐसे क्षेत्र हैं जहां 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया था। ऐसे में 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले इसे भाजपा के ‘ग्राउंड कनेक्ट’ को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
छिंदवाड़ा को लंबे समय तक कांग्रेस का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सात सीटें कांग्रेस ने जीती थीं, हालांकि बाद में अमरवाड़ा विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज कर ली। इसके बाद लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने छिंदवाड़ा की लोकसभा सीट अपने कब्जे में ले ली। ऐसे में मुख्यमंत्री का जनविश्वास अभियान छिंदवाड़ा से शुरू होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया।
अभियान के दौरान मुख्यमंत्री सिर्फ जनता से संवाद तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अधिकारियों के कामकाज पर भी सख्ती का संदेश दिया गया। छिंदवाड़ा में अभियान के पहले ही दिन सीएमएचओ और तहसीलदार समेत तीन अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई हुई। टीकमगढ़ में जिला पंजीयक सहकारिता को निलंबित किया गया और कुंडेश्वर धाम को ‘कुंडेश्वर लोक’ के रूप में विकसित करने की घोषणा की गई। बड़वानी में भी तहसीलदार, दो सीएमओ समेत सात अधिकारियों पर कार्रवाई की गई।
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इन क्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी करीब 22 प्रतिशत बताई जाती है और विधानसभा की 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। जनविश्वास अभियान के चार प्रमुख जिलों में छिंदवाड़ा, बड़वानी और बालाघाट आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं। 2023 में भाजपा ने राज्य की 47 आदिवासी आरक्षित सीटों में से 24 पर जीत हासिल की थी, जबकि कांग्रेस 22 सीटें जीतने में सफल रही थी।
चारों जिलों की 20 विधानसभा सीटों का राजनीतिक गणित भी भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण है। छिंदवाड़ा में पाढुर्ना समेत सात सीटों पर 2023 में कांग्रेस जीती थी, हालांकि अमरवाड़ा उपचुनाव के बाद तस्वीर बदली। बालाघाट की छह सीटों में कांग्रेस ने चार और भाजपा ने दो सीटें जीती थीं। बड़वानी की चार सीटों में कांग्रेस को तीन और भाजपा को एक सीट मिली थी। टीकमगढ़ की तीन सीटों में कांग्रेस ने दो और भाजपा ने एक सीट जीती थी। इस तरह उपचुनाव के बाद इन चार जिलों की 20 सीटों में कांग्रेस के पास 15 और भाजपा के पास पांच सीटें हैं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, जनविश्वास अभियान भाजपा सरकार के लिए दोहरी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। एक तरफ मुख्यमंत्री सीधे जनता के बीच जाकर सरकारी योजनाओं और शिकायतों पर कार्रवाई का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे क्षेत्रों में पार्टी का संगठन और जनाधार मजबूत करने की कोशिश हो रही है जहां कांग्रेस अभी भी मजबूत स्थिति में है।
हालांकि इस अभियान की असली परीक्षा 2028 के विधानसभा चुनाव में होगी। जनता की शिकायतों का कितना प्रभावी समाधान होता है और मुख्यमंत्री का सीधा जनसंपर्क वोटरों के राजनीतिक रुझान को कितना बदल पाता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल ‘जनविश्वास’ अभियान को भाजपा की ओर से मिशन 2028 की शुरुआती राजनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
जनविश्वास अभियान के जरिए मुख्यमंत्री मोहन यादव उन इलाकों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं जहां कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया था। प्रशासनिक कार्रवाई, जनता से सीधा संवाद और आदिवासी क्षेत्रों में सक्रियता के जरिए भाजपा 2028 से पहले अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश में है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह अभियान कांग्रेस के मजबूत इलाकों में भाजपा के जनाधार को कितना प्रभावित करता है।
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