भोज मुक्त विश्वविद्यालय में 40% कमीशनखोरी का महाघोटाला, लोकायुक्त में पूर्व रजिस्ट्रार सुशील मंडेरिया पर एफआईआर दर्ज, बैंक से वसूली का सनसनीखेज पर्दाफाश, क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव करेंगे निलंबित?

भोपाल (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा तंत्र में शुचिता, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ के सरकारी दावों की कलई एक बार फिर पूरी तरह से खुल गई है। मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय (भोपाल) में सरकारी धन की खुली बंदरबांट, टेंडर कमीशनखोरी और प्रशासनिक आतंक का ऐसा खौफनाक मामला सामने आया है, जिसने समूचे प्रशासनिक व शैक्षणिक महकमे की चूलें हिला दी हैं। विश्वविद्यालय के वेंडर फर्म ‘के.वी. प्रिंटर्स’ (मेरठ) के व्यवस्थापक श्री राजीव शर्मा द्वारा साक्ष्यों सहित की गई विधिवत शिकायत के आधार पर लोकायुक्त संगठन, म.प्र. ने तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. सुशील मंडेरिया के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण क्रमांक 311/ई/2026-27 पंजीबद्ध कर विस्तृत जांच शुरू कर दी है।

परंतु इस महाघोटाले के उजागर होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या राज्य सरकार का ‘जीरो टॉलरेंस’ केवल कागजी जुमला बनकर रह गया है? इतने संगीन और दस्तावेजी आरोपों के बावजूद डॉ. मंडेरिया को न केवल प्रोफेसर के पद पर बनाए रखा गया है, बल्कि राज्य स्तरीय पर्यावरण समाघात निर्धारण प्राधिकरण (SEIAA / सिया) जैसी अत्यंत प्रभावशाली और नीतिगत समितियों में उच्च पदों पर बिठाकर उपकृत किया जा रहा है। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर टिकी हैं कि क्या वे इस भ्रष्ट सिंडिकेट पर बुलडोजर जैसी सख्त कार्रवाई करेंगे या फिर रसूख के आगे व्यवस्था नतमस्तक हो जाएगी?

35 लाख की नकदी और बैंक तक साये की तरह पीछा, खौफनाक उगाही की दास्तान

लोकायुक्त में दर्ज कराई गई शिकायत और बैंक साक्ष्यों के अनुसार, यह मामला सीधे तौर पर संगठित फिरौती जैसा प्रतीत होता है। पीड़ित वेंडर राजीव शर्मा ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय के गोपनीय प्रश्नपत्र मुद्रण के कार्य के बकाया बिलों के भुगतान के बदले तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. सुशील मंडेरिया ने सीधे तौर पर 40% कमीशन की अवैध और गैर-कानूनी मांग रखी थी। काम पूरा होने और वेंडर के आर्थिक रूप से फंसे होने का नाजायज फायदा उठाते हुए भुगतान को महीनों तक अटकाया गया।

पीड़ित के मुताबिक, 2 अप्रैल 2026 को बिल पास कराने और भुगतान जारी करने के बहाने विश्वविद्यालय के वित्त शाखा से जुड़े एक कर्मचारी (विशाल) को उनके साथ भेजा गया। शासकीय प्रक्रिया के तहत जैसे ही बैंक ऑफ बड़ौदा से आरटीजीएस (RTGS) के जरिए भुगतान वेंडर के खाते में पहुंचा, तुरंत बाद यस बैंक (एमपी नगर, भोपाल) की मुख्य शाखा से 35 लाख रुपये नकद आहरित कराए गए। आरोप है कि यह कर्मचारी बैंक के भीतर और बाहर तब तक साये की तरह पीड़ित के आगे-पीछे लगा रहा, जब तक कि कमीशन की भारी-भरकम राशि (32.60 लाख रुपये से अधिक) एक लैपटॉप बैग में भरकर उच्च अधिकारियों के ठिकाने तक नहीं पहुंचा दी गई।

यस बैंक के सीसीटीवी फुटेज, दोनों व्यक्तियों की मोबाइल टावर लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड्स और संबंधित व्हाट्सएप संदेश इस सुनियोजित वसूली की चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं। यह कोई सामान्य रिश्वतखोरी नहीं, बल्कि राज्य के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के प्रशासनिक संरक्षण में की गई खुली डकैती है।

कमीशन का सिंडिकेट, कुलपति की रहस्यमयी चुप्पी और ‘कमाओ-खाओ‘ संस्कृति

इस पूरे घटनाक्रम में भोज मुक्त विश्वविद्यालय के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर कुलपति महोदय की संदेहास्पद भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। यह संभव ही नहीं है कि जिस विश्वविद्यालय परिसर और रजिस्ट्रार आवास से करोड़ों रुपये की उगाही का खुला खेल खेला जा रहा हो, उसकी भनक कुलपति को न हो। सवाल उठता है कि जब वेंडर दफ्तरों के चक्कर काट रहा था और विश्वविद्यालय के कर्मचारी निजी बैंकों में जाकर बैग भर-भरकर नकदी वसूल रहे थे, तब कुलपति क्या कर रहे थे?

क्या भोज विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पूरी तरह से ‘कमाओ, खाओ और आंखें मूंद लो’ के सिद्धांत पर संचालित हो रही थी? दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से प्रदेश के दूर-दराज के गरीब, ग्रामीण और वंचित छात्रों को शिक्षित करने के उद्देश्य से स्थापित इस संस्थान को अधिकारियों ने अपनी निजी जागीर बना लिया। छात्रों के विकास और जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई के टैक्स के पैसे से शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के बजाय, टेंडर सिंडिकेट बनाने, कमीशन तय करने और विलासिता पूर्ण महंगी गाड़ियों की खरीद को प्राथमिकता दी गई।

विश्वविद्यालय के जानकारों का कहना है कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है। इससे पहले भी ‘प्रेस्टीज टेक्नोलॉजी’ जैसी प्रतिष्ठित फर्मों ने इसी तरह की प्रताड़ना, अनुचित मांगों और अवैध कमीशन के दबाव के चलते बीच में ही काम छोड़ दिया था। वेंडरों को प्रताड़ित करना, उनके बिल रोकना और अंततः उन्हें घुटनों पर लाकर 40% तक कमीशन वसूलना इस विश्वविद्यालय की एक नियमित कार्यप्रणाली बन चुकी थी।

इतने गंभीर आरोपों के बाद भी मंडेरिया पर मेहरबानी क्यों? ‘सिया‘ और प्रोफेसर पद की ढाल

लोकायुक्त में आपराधिक प्रकरण क्रमांक 311/ई/2026-27 दर्ज होने और सीसीटीवी व डिजिटल साक्ष्य सामने आने के बाद भी डॉ. सुशील मंडेरिया के विरुद्ध कोई कठोर प्रशासनिक कार्रवाई न होना तंत्र की सड़ांध को उजागर करता है। मंडेरिया को रजिस्ट्रार पद से हटाने के बाद निलंबित करने के बजाय उन्हें प्रोफेसर के गरिमामयी पद पर आसीन रखा गया है।

इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उन्हें पर्यावरण जैसे संवेदनशील और वित्तीय दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रभाव रखने वाले निकाय ‘सिया’ (SEIAA) की प्रमुख समिति में उच्च पद पर बैठाया गया है। जो व्यक्ति शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में 40% कमीशनखोरी के गंभीर आरोपों और लोकायुक्त जांच का सामना कर रहा हो, उसे पर्यावरण मंजूरी देने वाली अत्यंत शक्तिशाली नियामक समिति में किसके इशारे पर बनाए रखा गया है? क्या यह साबित नहीं करता कि सिस्टम भ्रष्टाचारियों को दंडित करने के बजाय उन्हें संरक्षण और पदोन्नति का पुरस्कार दे रहा है?

नेहा पचीसिया पर त्वरित एक्शन, तो मंडेरिया पर रहम क्यों? क्या कानून सबके लिए अलग है?

मध्य प्रदेश की जनता अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रशासनिक रुख को बेहद बारीकी से देख रही है। हाल ही में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी नेहा पचीसिया के मामले में जिस प्रकार राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ने त्वरित, कड़ा और बिना किसी हिचकिचाहट के एक्शन लेकर अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ छवि को मजबूती दी थी, ठीक वही पैमाना यहां क्यों नहीं अपनाया जा रहा?

क्या मध्य प्रदेश में कानून का पैमाना अधिकारियों के रसूख और उनकी राजनीतिक पहुंच के आधार पर बदल जाता है? एक तरफ एक पीड़ित वेंडर है जो पहले से व्यापारिक घाटे और मानसिक अवसाद से जूझ रहा है, जिसने अपनी बर्बादी की दास्तान सबूतों के साथ सामने रखी; और दूसरी तरफ एक ऐसा पूर्व रजिस्ट्रार है जो खुद को सत्ता और मुख्यमंत्री का करीबी बताकर पूरे प्रशासनिक तंत्र पर धौंस जमाता है।

यदि एक अधिकारी पर आरोप लगते ही सरकार सख्त एक्शन ले सकती है, तो डॉ. सुशील मंडेरिया को अब तक निलंबित (सस्पेंड) क्यों नहीं किया गया? क्या ‘सीएम का करीबी’ होना भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई से सुरक्षा कवच बन जाता है? यह सवाल आज प्रदेश के हर जागरूक नागरिक और ईमानदार अधिकारी के जेहन में गूंज रहा है।

मुख्यमंत्री की अग्निपरीक्षा, प्रदेश पहले या भ्रष्ट अधिकारी?

यह मामला अब केवल भोज विश्वविद्यालय के एक टेंडर घोटाले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की व्यक्तिगत राजनीतिक छवि और साख की कसौटी बन चुका है। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम है कि कथित तौर पर खुद को मुख्यमंत्री का नजदीकी बताने वाले डॉ. मंडेरिया को क्या वाकई मुख्यमंत्री कार्यालय से कोई मौन अभयदान मिला हुआ है, या फिर यह केवल भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा अपनी चमड़ी बचाने के लिए रसूख का दुरुपयोग है?

मुख्यमंत्री को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि उनके लिए:

यदि सरकार ऐसे गंभीर आरोपों और लोकायुक्त में दर्ज केस के बाद भी डॉ. मंडेरिया को तत्काल प्रभाव से निलंबित नहीं करती और सिया कि समिति के पदों से बाहर का रास्ता नहीं दिखाती, तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे महज चुनावी जुमले हैं। सरकार को यह तय करना होगा कि वह एक दागी अधिकारी के पक्ष में खड़े होकर अपनी छवि बिगाड़ेगी या फिर उसे सलाखों के पीछे भेजकर ईमानदार शासन की नजीर पेश करेगी।

जनता और पीड़ित व्यापारी की प्रमुख मांगें

इस महाघोटाले के खुलासे के बाद प्रदेश के शिक्षाविदों, छात्रों और व्यापारिक संगठनों में भारी आक्रोश है। ब्रांडवाणी समाचार आम जनता और पीड़ित पक्ष के साथ मिलकर शासन व राजभवन से निम्नलिखित ठोस कदमों की मांग करता है:

अब गेंद महामहिम कुलाधिपति (राज्यपाल) और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पाले में है। देखना यह होगा कि मध्य प्रदेश का शासन तंत्र एक पीड़ित वेंडर की पुकार सुनकर न्याय करता है या फिर रसूखदार सिंडिकेट एक बार फिर कानून के फंदे से साफ बच निकलता है।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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