
भोपाल (विशेष खोजी रिपोर्ट / ब्रांडवाणी समाचार)
मध्य प्रदेश में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने, उद्यमशीलता को नई दिशा देने और कौशल विकास के जरिए रोजगार सृजन के संकल्प के साथ स्थापित ‘उद्यमिता विकास केंद्र’ (सेडमैप – CEDMAP) इन दिनों भारी प्रशासनिक अराजकता और संस्थागत भ्रष्टाचार के भंवर में फंसा नजर आ रहा है। राज्य सरकार जिस मंच के जरिए लाखों युवाओं के भविष्य को संवारने का दावा करती है, वही मंच अब चंद स्वार्थी अधिकारियों और बिचौलियों के गठजोड़ का चारागाह बन चुका है। ब्रांडवाणी समाचार द्वारा पूर्व में किए गए खुलासे के बाद जब परतें उधेड़नी शुरू हुईं, तो सेडमैप के प्रशासनिक गलियारों से जो तथ्य बाहर आए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि पूरी व्यवस्था पर एक गहरा तमाचा हैं।
संस्था के कार्यपालन संचालक (ED) राजेंद्र सिंह द्वारा एक ही चहेती कंपनी ‘आरबी एसोसिएट्स’ को लगातार उपकृत करने की हठधर्मिता, पूर्व में निलंबित हो चुके अधिकारी दिनेश खरे की मुख्यालय में अनधिकृत मगर ‘सुपर एक्टिव’ भूमिका, और सूचीबद्ध वेंडर फर्मों से प्रति माह लाखों रुपयों की कथित अवैध वसूली के आरोपों ने संस्था की साख को धूल में मिला दिया है। सबसे बड़ा सवाल तो यह उठ रहा है कि जिस वल्लभ भवन (मंत्रालय) पर पूरे प्रदेश की शुचिता की जिम्मेदारी है, उसी के 5वें माले पर बैठे शीर्ष नेतृत्व को यह सब दिखाई क्यों नहीं दे रहा? क्या वल्लभ भवन का 5वां माला आंखें मूंदकर किसी ‘धृतराष्ट्र’ की भूमिका में आ चुका है?
निलंबित दिनेश खरे की ‘सुपर एक्टिव’ वापसी, नियमों की उड़ती धज्जियां
सेडमैप मुख्यालय से छनकर आ रही खबरें बेहद सनसनीखेज हैं। पूर्व में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, संदिग्ध गतिविधियों और अनुशासनहीनता के चलते निलंबित किए जा चुके अधिकारी दिनेश खरे इन दिनों संस्था में किसी ‘सुपर बॉस’ की तरह विचरण कर रहे हैं। सिविल सेवा आचरण और किसी भी अर्द्ध-शासकीय संस्था के सेवा नियमों के मुताबिक, यदि किसी अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही हो या वह निलंबन की स्थिति में हो, तो उसे संस्था के नीतिगत फैसलों, दैनिक प्रशासनिक संचालन और निविदा प्रक्रियाओं से पूरी तरह अलग रखा जाता है।
लेकिन सेडमैप में कायदे-कानून शायद किसी निजी जागीर की तरह ताक पर रख दिए गए हैं। सूत्रों का पुख्ता दावा है कि दिनेश खरे न केवल रोज मुख्यालय में समय बिता रहे हैं, बल्कि महत्वपूर्ण फाइलों के मूवमेंट, वेंडरों की मीटिंग्स और ट्रांसफर-पोस्टिंग जैसे नीतिगत निर्णयों में उनकी सीधी दखलंदाजी है। कहा जा रहा है कि वर्तमान ईडी राजेंद्र सिंह के साथ उनकी ‘जुगलबंदी’ इतनी मजबूत हो चुकी है कि कौन सी फाइल आगे बढ़ेगी और किसका भुगतान रोका जाएगा, यह खरे के इशारे के बिना तय नहीं होता। एक निलंबित अधिकारी का इस कदर संस्था पर काबिज होना साफ दर्शाता है कि संस्था के भीतर प्रशासनिक मर्यादाएं पूरी तरह दम तोड़ चुकी हैं।
सूत्रों के अनुसार फर्मों से प्रति माह ₹ लाखों की उगाही और चहेती फर्म पर मेहरबानी
सेडमैप से जुड़े वेंडरों, आउटसोर्स एजेंसियों और कंसल्टेंट्स के बीच इस समय जबरदस्त आक्रोश और भय का माहौल है। प्रशासनिक सूत्रों और वेंडर लॉबी के बीच खुलेआम फुसफुसाहट है कि सेडमैप में काम जारी रखने और नियमित बिलों का भुगतान पास कराने के एवज में सूचीबद्ध फर्मों से कथित तौर पर प्रति माह 1-1 लाख रुपये की अनुचित मांग की जा रही है।
आरोप हैं कि जिन फर्मों ने इस अनैतिक सिंडिकेट के आगे घुटने टेकने से इनकार किया, उनकी फाइलों में मनमाने तकनीकी अड़ंगे लगाकर भुगतान रोक दिए गए। वहीं दूसरी तरफ, नियमों को शिथिल करते हुए ‘आरबी एसोसिएट्स’ जैसी खास चहेती फर्मों के लिए रेड कार्पेट बिछाया जा रहा है। टेंडर की शर्तों को इस तरह से मोड़ा-मरोड़ा जा रहा है कि प्रतिस्पर्धा पूरी तरह समाप्त हो जाए और सारा बड़ा काम एकलौते सिंडिकेट की झोली में चला जाए। जब कोई एजेंसी निष्पक्ष जांच की मांग करती है, तो उसे संस्था से बाहर का रास्ता दिखाने या काली सूची (ब्लैकलिस्ट) में डालने की धमकियां दी जाती हैं।
वल्लभ भवन का 5वां माला, आखिर भ्रष्टाचार को किसका ‘अभयदान‘?
राजधानी की सत्ता के केंद्र ‘वल्लभ भवन’ के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि ईडी राजेंद्र सिंह और उनके सिंडिकेट को यह बेखौफ अंदाज कहां से हासिल हो रहा है? सामान्य परिस्थितियों में यदि किसी संस्था प्रमुख पर इतने गंभीर आरोप लगें और निलंबित अधिकारी कार्यालय चला रहा हो, तो चंद घंटों में जांच बैठ जाती है। मगर सेडमैप के मामले में हर शिकायत एक रहस्यमयी सन्नाटे में विलीन हो जाती है।
सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय के 5वें माले पर बैठने वाले एक बेहद शक्तिशाली और रसूखदार शीर्ष अधिकारी का हाथ इस सिंडिकेट की पीठ पर है। 5वें माले से मिलने वाले इसी अभयदान के चलते न तो लोकायुक्त व ईओडब्ल्यू (EOW) तक पहुंची शिकायतों पर तुरंत कोई संज्ञान लिया जाता है, और न ही विभागीय स्तर पर कोई विजिलेंस जांच आगे बढ़ती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वल्लभ भवन का यह महत्वपूर्ण तल धृतराष्ट्र की भूमिका में आ चुका है—जहां सब कुछ जानते-बूझते हुए भी भ्रष्टाचार के कौरवों को मनमानी करने की खुली छूट दे दी गई है। भ्रष्टाचार जितना गहरा हो रहा है, इन भ्रष्ट अधिकारियों के पैर उतने ही मजबूती से जमते जा रहे हैं।
मंडी बोर्ड तक पहुंचेगी सिंडिकेट की आंच, कनेक्शन और संभावित असर
इस सिंडिकेट का प्रभाव सिर्फ सेडमैप के 16/ए, अरेरा हिल्स स्थित दफ्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार मध्य प्रदेश राज्य कृषि विपणन बोर्ड (मंडी बोर्ड) तक भी गहरे जुड़े बताए जा रहे हैं। गौरतलब है कि कृषि क्षेत्र में अधोसंरचना विकास, डिजिटलाइजेशन, ई-मंडी परियोजना और आउटसोर्स मानव संसाधन प्रबंधन के लिए मंडी बोर्ड द्वारा सेडमैप और उससे जुड़ी सहयोगी एजेंसियों की सेवाएं बड़े पैमाने पर ली जाती रही हैं।
यदि सेडमैप का यह सिंडिकेट अनियंत्रित रहा, तो मंडी बोर्ड की कार्यप्रणाली पर इसका सीधा और घातक असर पड़ना तय है:
- आउटसोर्सिंग में भारी गड़बड़ी: मंडी बोर्ड में डाटा एंट्री ऑपरेटरों, सुरक्षा गार्डों और तकनीकी सहायकों की तैनाती अक्सर आउटसोर्स एजेंसियों के जरिए होती है। यदि सेडमैप स्तर पर चहेती कंपनियों को उपकृत किया गया, तो मंडी बोर्ड को अकुशल मैनपावर मिलेगी, जिससे प्रदेश भर की कृषि उपज मंडियों का कामकाज ठप हो सकता है।
- ई-मंडी व तकनीकी परियोजनाओं पर ब्रेक: किसानों की उपज की ऑनलाइन नीलामी और डिजिटल भुगतान से जुड़ी कई परियोजनाओं में तकनीकी कंसल्टेंसी सेडमैप से जुड़ी वेंडर लॉबी के हाथों में रही है। अगर कमीशनखोरी के फेर में गुणवत्ताविहीन फर्मों को काम दिया गया, तो सीधे तौर पर प्रदेश के लाखों किसानों का भुगतान और उपज की खरीद-बिक्री प्रभावित होगी।
- वित्तीय संदेहास्पद लेनदेन: मंडी बोर्ड के भारी-भरकम बजट से सेडमैप को ट्रांसफर होने वाली ट्रेनिंग और कंसल्टेंसी फीस का एक बड़ा हिस्सा इसी सिंडिकेट द्वारा निजी लाभ के लिए इधर-उधर किए जाने की आशंका गहराने लगी है। इससे मंडी बोर्ड का आंतरिक ऑडिट भी जांच के दायरे में आना तय है।
मोहन सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर सीधे सवाल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार मंचों से यह दोहरा रहे हैं कि मध्य प्रदेश में सुशासन और भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ ही सरकार का मूल मंत्र है। लेकिन जब जमीन पर सेडमैप जैसी सार्वजनिक संस्थाओं का यह हाल दिखाई देता है, तो जनता और कर्मचारियों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह जीरो टॉलरेंस केवल भाषणों तक सीमित है?
- निलंबित अधिकारी की उपस्थिति पर चुप्पी क्यों? यदि दिनेश खरे पर निलंबन की कार्रवाई हुई थी, तो वह रोजाना किस हैसियत से सेडमैप कार्यालय में बैठकर फैसले तय कर रहे हैं? संस्था के सीसीटीवी फुटेज और विज़िटर रजिस्टरों की पड़ताल क्यों नहीं की जाती?
- वसूली के आरोपों की जांच कब? क्या सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) विभाग फर्मों से 1-1 लाख रुपये की कथित वसूली के आरोपों पर कोई गोपनीय विजिलेंस टीम गठित करेगा?
- 5वें माले की चुप्पी का राज क्या? वल्लभ भवन का 5वां माला कब तक इस सिंडिकेट को सुरक्षा कवच प्रदान करता रहेगा? क्या शीर्ष नौकरशाही अपने चहेतों को बचाने के लिए पूरी संस्था को बलि चढ़ाने को तैयार है?
तत्काल उच्च स्तरीय जांच की दरकार
सेडमैप किसी निजी घराने की फर्म नहीं है; यह मध्य प्रदेश शासन के विभिन्न विभागों के सहयोग से संचालित एक ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य युवाओं का भविष्य संवारना था। आज यह संस्था कुछ भ्रष्ट चेहरों के आपसी गठजोड़ के कारण अपनी न्यूनतम साख भी खोती जा रही है।
आउटसोर्सिंग पर तैनात हजारों निर्दोष कर्मचारियों के अधिकारों, पारदर्शी वेंडरों के हितों और शासन की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए अब केवल विभागीय जांच का दिखावा काफी नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले को तत्काल विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त) अथवा आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) को सौंपा जाए। संस्था के पिछले दो वर्षों के सभी टेंडरों, आरबी एसोसिएट्स को दिए गए ठेकों, बिल भुगतानों और वल्लभ भवन के 5वें माले तक के कॉल/दस्तावेजी संबंधों की फॉरेंसिक जांच कराई जाए—ताकि सच सामने आए और दूध का दूध, पानी का पानी हो सके।






