
उत्तराखंड के चमोली जिले में बसा ग्वालदम शांत वातावरण, घने जंगलों और हिमालयी चोटियों के खूबसूरत नजारों के लिए जाना जाता है। करीब 1,940 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह जगह गढ़वाल और कुमाऊं की सीमा पर बसी है। कभी इसकी प्राकृतिक सुंदरता से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने यहां 1890 में सरकारी गेस्ट हाउस भी बनवाया था। आज भी यहां जंगल, सेब के बाग, पुराने भवन और ट्रेकिंग रूट पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
गढ़वाल-कुमाऊं के मिलन बिंदु पर बसा है ग्वालदम
चमोली जिले का ग्वालदम समुद्र तल से करीब 1,940 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों की सीमा के करीब होने के कारण दोनों पहाड़ी संस्कृतियों का संगम भी माना जाता है। आसपास बांज, बुरांश और देवदार के जंगल दिखाई देते हैं।
यहां से हिमालय की कई ऊंची चोटियों के नजारे दिखाई देते हैं। नंदा देवी, त्रिशूल और नंदा घुंघुटी जैसी चोटियां इस इलाके की प्राकृतिक खूबसूरती को और खास बनाती हैं।
अंग्रेजों ने 1890 में बनवाया था गेस्ट हाउस
ग्वालदम की खूबसूरती ने ब्रिटिश दौर में भी लोगों का ध्यान खींचा था। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अंग्रेजों ने वर्ष 1890 में यहां एक सरकारी गेस्ट हाउस बनवाया था। वर्तमान में इसकी देखरेख उत्तराखंड वन विभाग करता है। गेस्ट हाउस के आसपास एक प्राकृतिक झील भी बताई जाती है, जहां पर्यटक पहुंचते हैं।
उत्तराखंड पर्यटन के दस्तावेज में भी ग्वालदम को पुराने समय से वन और पहाड़ों से प्रेम करने वाले लोगों के लिए आकर्षक स्थान बताया गया है। यहां पुराने औपनिवेशिक दौर के समर कॉटेज के अवशेष और प्राकृतिक रास्ते मौजूद होने का उल्लेख मिलता है।
ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए खास जगह
ग्वालदम सिर्फ शांत पहाड़ी वातावरण के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रेकिंग के लिए भी महत्वपूर्ण है। यहां से आसपास के जंगलों और पहाड़ी इलाकों में कई पैदल मार्ग निकलते हैं।
यह क्षेत्र बेड़नी बुग्याल और पिंडारी ग्लेशियर जैसे ऊंचाई वाले इलाकों की ओर जाने वाले ट्रेकिंग रूट के लिए भी आधार क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल होता रहा है।
ग्वालदम के आसपास बधाणगढ़ी भी प्रमुख आकर्षण है। यहां स्थित प्राचीन देवी भगवती मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ पहाड़ी प्राकृतिक दृश्यों के कारण भी लोगों को आकर्षित करता है।
200 किलोमीटर लंबा लॉर्ड कर्जन ट्रेक भी खास
ग्वालदम से जुड़ा लॉर्ड कर्जन ट्रेक भी इस क्षेत्र की पहचान में शामिल है। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, यह करीब 200 किलोमीटर लंबा ट्रेक है। पहाड़ों, जंगलों और ग्रामीण इलाकों से गुजरने वाला यह मार्ग एडवेंचर और प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र माना जाता है।
नंदा देवी राजजात यात्रा का भी मार्ग
ग्वालदम की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी मजबूत है। यह नंदा देवी राजजात यात्रा के प्रमुख मार्गों में शामिल है। इस यात्रा से जुड़े धार्मिक महत्व के कारण भी आसपास के क्षेत्रों में इसकी अलग पहचान है।
इसके अलावा ग्वालदम का नाम मैती आंदोलन से भी जुड़ा है। जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, ऐतिहासिक मैती आंदोलन की शुरुआत इसी क्षेत्र से हुई थी।
ग्वालदम की सबसे बड़ी खूबी है सुकून
मसूरी, नैनीताल और औली जैसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की तुलना में ग्वालदम अपेक्षाकृत शांत जगह है। उत्तराखंड पर्यटन के आधिकारिक दस्तावेज में भी इसे पर्यावरण आधारित पर्यटन के लिए संभावनाशील क्षेत्र बताया गया है। यहां की ग्रामीण वास्तुकला, जंगल और प्राकृतिक पैदल रास्ते इसकी अलग पहचान बनाते हैं।
दिल्ली से कैसे पहुंचें?
ग्वालदम पहुंचने के लिए दिल्ली से सड़क मार्ग अपनाया जा सकता है। जागरण के अनुसार मार्ग दिल्ली → मेरठ → मुजफ्फरनगर → रुड़की → ऋषिकेश → देवप्रयाग → कर्णप्रयाग → थराली → ग्वालदम है।
अगर आप भीड़भाड़ से दूर पहाड़ों में कुछ दिन सुकून बिताना चाहते हैं, तो ग्वालदम उत्तराखंड के उन कम चर्चित ठिकानों में शामिल है जहां प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और ट्रेकिंग- चारों का अनुभव एक साथ मिलता है।
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