
भारत में थोक महंगाई दर (WPI) जनवरी महीने में बढ़कर 1.81% पर पहुंच गई, जो पिछले 10 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य वस्तुओं, खासकर सब्जियों और कृषि उत्पादों की कीमतों में तेज उछाल के कारण हुई है। पिछले महीनों में थोक महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही थी, लेकिन नए साल की शुरुआत में खाद्य लागत बढ़ने से महंगाई का दबाव फिर बढ़ता दिख रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार सब्जियों, खाद्य पदार्थों और कुछ मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की थोक कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम, सप्लाई चेन बाधाएं और उत्पादन लागत में वृद्धि इसके प्रमुख कारण हैं। खासकर सब्जियों की कीमतों में तेजी ने कुल खाद्य महंगाई को ऊपर धकेला, जिससे थोक सूचकांक में उछाल आया।
थोक महंगाई में वृद्धि को खुदरा महंगाई (CPI) के लिए अग्रिम संकेत माना जाता है। यानी आने वाले महीनों में बाजार में सब्जियां, अनाज, दालें और पैकेज्ड खाद्य उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इससे आम परिवारों की रसोई लागत बढ़ने की संभावना है। आर्थिक दृष्टि से यह भी संकेत है कि कृषि और खाद्य सप्लाई सेक्टर में लागत दबाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि खाद्य कीमतों में यह ट्रेंड जारी रहता है तो महंगाई नियंत्रण की नीति पर भी असर पड़ सकता है। रिजर्व बैंक और सरकार दोनों के लिए खाद्य मुद्रास्फीति एक प्रमुख चिंता रहती है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव उपभोक्ता खर्च और आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है। जनवरी का WPI आंकड़ा इसी बढ़ते लागत दबाव का संकेत दे रहा है।









