
शहर का हाल: एक तरफ जिले की कमान संभालने वाले युवा एसपी साहब की ईमानदारी है, तो दूसरी तरफ एक ‘टीआइ पुत्र‘ का समानांतर साम्राज्य। आलम यह है कि पुलिस की दबिश भी अब महज़ एक औपचारिकता बनकर रह गई है। चर्चा है कि जब रक्षक का अपना ही कुनबा भक्षक को संरक्षण देने लगे, तो कानून के हाथ बंधना लाजिमी है।
दबिश का ‘ड्रामा‘ और रसूख का ‘सुरक्षा कवच‘
हाल ही में जब जुए, सट्टे और नशे के अवैध कारोबार की खबरें एसपी साहब के कानों तक पहुंचीं, तो उन्होंने ‘सिंघम‘ अवतार दिखाते हुए अपनी स्पेशल टीम को मैदान में उतारा। छापेमारी हुई, सामान जब्त हुआ, लेकिन असली ‘खिलाड़ी‘ तक पुलिस के हाथ पहुँचने से पहले ही मुड़ गए। जानकारों की मानें तो इस पूरी कार्रवाई में असली किरदार (टीआइ पुत्र) को बड़े ही करीने से ‘सेफ पैसेज‘ दिया गया।
प्रशासन की नाक के नीचे चल रही ‘समानांतर सरकार‘
- अवैध साम्राज्य: जिले के कई इलाकों में खुलेआम सट्टे की फड़ सज रही है।
- नशे का जाल: युवाओं की रगों में ज़हर घोलने वाला नशे का कारोबार फल–फूल रहा है।
- बुलडोजर भी हुआ पस्त: हद तो तब हो गई जब अवैध निर्माण ढहाने गई जिला प्रशासन की टीम को ‘ऊपर‘ के दबाव में बैरंग लौटना पड़ा।
बड़ा सवाल: वर्दी भारी या विरासत?
शहर के गलियारों में अब एक ही सवाल गूँज रहा है—क्या एक युवा और ईमानदार एसपी की साख पर यह ‘टीआइ पुत्र‘ भारी पड़ेगा? पुलिस विभाग के ही कुछ लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि जब घर का भेदी ही लंका ढाने पर उतारू हो, तो बाहर वाले को क्या दोष देना।
तीखी प्रतिक्रिया: > “कानून की साख इकबाल से होती है, दिखावे की छापेमारी से नहीं। अगर एक अदना सा ‘टीआइ पुत्र‘ पूरी प्रशासनिक मशीनरी को ठेंगा दिखा रहा है, तो यह सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है। जनता देख रही है कि वर्दी का खौफ अपराधियों में है या अपराधियों का खौफ वर्दी पर!”







