
सार
“दमादम मस्त कलंदर” ऐसी मशहूर सूफियाना रचना है, जिसे सुनते ही लोग झूमने लगते हैं। इस कलाम की लोकप्रियता भारत से लेकर पाकिस्तान तक रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसमें जिस झूलेलाल का जिक्र होता है, वह कौन हैं और इस कलाम का अमीर खुसरो से क्या संबंध बताया जाता है?
विस्तार
अमीर खुसरो को भारतीय उपमहाद्वीप की संगीत और साहित्यिक परंपरा के प्रमुख नामों में गिना जाता है। वे कवि, संगीतज्ञ और सूफी परंपरा से जुड़े व्यक्तित्व थे। उनकी रचनाओं में भारतीय और फारसी सांस्कृतिक प्रभावों का अनूठा मेल देखने को मिलता है।
‘दमादम मस्त कलंदर’ को लेकर भी अमीर खुसरो का नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है। हालांकि, इस रचना के वर्तमान लोकप्रिय रूप का स्वरूप अलग-अलग दौर में बदलता रहा है और इसे कई गायकों व कव्वालों ने अपनी शैली में पेश किया है।
‘झूलेलाल’ सिंध क्षेत्र में पूजनीय लोकदेवता के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्हें विशेष रूप से सिंधी हिंदू समुदाय में श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। मान्यता के अनुसार झूलेलाल का संबंध जल और सिंधु नदी से माना जाता है।
लोकपरंपराओं में उन्हें अलग-अलग नामों से संबोधित किया गया है। यही वजह है कि ‘झूलेलाल’ का उल्लेख सिंध की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
इस कलाम की खासियत यह है कि इसमें सूफी और लोक आस्था के तत्व एक साथ दिखाई देते हैं। यही वजह है कि यह किसी एक समुदाय या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ इसे कव्वाली, सूफी संगीत और लोकप्रिय संगीत की अलग-अलग शैलियों में गाया गया।
‘दमादम मस्त कलंदर’ में आने वाले शब्द और संबोधन सिंध की लोक-संस्कृति, सूफी परंपरा और वहां की साझा सांस्कृतिक विरासत की झलक देते हैं। इसी कारण यह रचना आज भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
कई दशक बीत जाने के बावजूद ‘दमादम मस्त कलंदर’ की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। अलग-अलग दौर में कई प्रसिद्ध कलाकारों ने इसे अपनी आवाज दी और नए संगीत के साथ पेश किया। धार्मिक आयोजनों से लेकर सूफी संगीत के मंचों तक इसकी गूंज सुनाई देती है।
इस कलाम की सबसे बड़ी खासियत इसकी साझी सांस्कृतिक विरासत है। अमीर खुसरो से जुड़ी सूफी परंपरा और सिंध के झूलेलाल से जुड़ी लोक आस्था इसे भारतीय उपमहाद्वीप की विविध संस्कृति का खास उदाहरण बनाती है।
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