
सागर/ मनीष कुमार चौबे: सागर में कोल्ड्रिफ कफ सिरप प्रकरण को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की सागर शाखा सक्रिय हो गई है। छिंदवाड़ा के मामले में डॉक्टरों की गिरफ्तारी के विरोध में IMA सागर के प्रतिनिधिमंडल ने संभागायुक्त अनिल सुचारी से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। संगठन ने जेल में बंद डॉक्टरों की रिहाई, व्यक्तिगत भूमिका की निष्पक्ष जांच और वैज्ञानिक एवं कानूनी आधार पर पूरे मामले की समीक्षा की मांग की है।
आईएमए ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के नाम भी ज्ञापन संभागायुक्त के माध्यम से भेजा है। साथ ही संगठन की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर किए जाने की जानकारी दी गई है।
मृतकों के प्रति संवेदना, लेकिन डॉक्टरों पर कार्रवाई का विरोध
आईएमए अध्यक्ष डॉ. तल्हा साद के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि इस दुखद प्रकरण में जिन लोगों की जान गई है, उनके प्रति चिकित्सा समुदाय की पूरी संवेदना है। संगठन का कहना है कि घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और वास्तविक दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
हालांकि, आईएमए ने इस बात पर आपत्ति जताई कि सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त और नियामकीय स्वीकृति वाली दवा का मरीजों के उपचार के लिए पर्चा लिखने वाले डॉक्टरों को भी आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। संगठन ने इसे चिकित्सकों के लिए चिंता और असुरक्षा का विषय बताया है।
तीन डॉक्टरों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग
ज्ञापन में कहा गया कि डॉ. प्रवीण सोनी, डॉ. एस.एस. ठाकुर और डॉ. अमन सिद्दीकी अभी जेल में हैं। आईएमए ने मांग की कि गिरफ्तार किए गए प्रत्येक डॉक्टर की भूमिका को अलग-अलग आधार पर देखा जाए।
संगठन के मुताबिक जांच में उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों और संबंधित कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यदि किसी डॉक्टर की व्यक्तिगत भूमिका में आपराधिक जिम्मेदारी नहीं बनती है तो उसे अनावश्यक रूप से जेल में रखने से राहत दी जानी चाहिए।
दवा की गुणवत्ता जांचना डॉक्टर का काम नहीं: IMA
आईएमए ने अपने ज्ञापन में तर्क दिया कि संबंधित कफ सिरप का निर्माण लाइसेंस प्राप्त कंपनी द्वारा किया गया था और दवा नियामकीय प्रक्रिया के बाद बाजार में उपलब्ध थी। डॉक्टरों ने मरीजों की जरूरत के अनुसार दवा लिखी।
संगठन का कहना है कि डॉक्टरों के पास किसी दवा के निर्माण की प्रक्रिया, उसमें मौजूद रसायनों की शुद्धता या प्रत्येक बैच की लैब जांच करने का वैधानिक अधिकार और व्यावहारिक व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में डॉक्टर की जिम्मेदारी की सीमा स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
जैकब मैथ्यू मामले का दिया हवाला
आईएमए अध्यक्ष डॉ. तल्हा साद ने सुप्रीम कोर्ट के जैकब मैथ्यू बनाम स्टेट ऑफ पंजाब 2005 मामले का हवाला देते हुए कहा कि चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में डॉक्टरों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी है।
आईएमए ने मांग की कि कोल्ड्रिफ प्रकरण में भी यह देखा जाए कि डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करते समय संबंधित न्यायिक और प्रक्रियात्मक मानकों का पालन किया गया या नहीं।
हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
आईएमए सागर ने इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है। संगठन के अनुसार रिट पेटिशन नंबर 35051/2026 के जरिए डॉक्टरों की कानूनी जिम्मेदारी की सीमा को लेकर न्यायिक मार्गदर्शन मांगा गया है।
याचिका में मुख्य सवाल यह रखा गया है कि किसी अनुमोदित दवा की गुणवत्ता, सुरक्षा और शुद्धता के लिए डॉक्टरों की जवाबदेही आखिर किस सीमा तक तय की जा सकती है। इसके अलावा केवल स्वीकृत दवा का पर्चा लिखने के आधार पर डॉक्टर को गिरफ्तार करने और आपराधिक मुकदमा चलाने की प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की मांग भी की गई है।
संभागायुक्त ने दिया कार्रवाई का आश्वासन
आईएमए प्रतिनिधिमंडल की मांगों को संभागायुक्त अनिल सुचारी ने गंभीरता से सुना। उन्होंने आश्वासन दिया कि मामले को राज्य सरकार और संबंधित सक्षम अधिकारियों के सामने रखा जाएगा।
आईएमए सागर ने स्पष्ट किया कि संगठन का उद्देश्य किसी दोषी व्यक्ति का बचाव करना नहीं है। संगठन की मांग है कि जांच में वास्तविक जिम्मेदारी तय हो और यदि निर्माता या गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े स्तर पर कोई गलती सामने आती है तो संबंधित लोगों पर कार्रवाई हो। साथ ही जिन डॉक्टरों की भूमिका केवल मरीजों के उपचार और दवा लिखने तक सीमित रही है, उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी का निष्पक्ष आकलन किया जाए।
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