
एक बड़े जिले में इन दिनों कलेक्टर साहब और एडिशनल कमिश्नर राजस्व के बीच अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है। कलेक्टर साहब जिले में अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए एक के बाद एक आदेश जारी कर रहे हैं, लेकिन जैसे ही ये मामले एडिशनल कमिश्नर की अदालत पहुंचते हैं, आदेशों पर स्टे लग जाता है। नतीजा यह है कि कलेक्टर साहब की कार्रवाई और एडिशनल कमिश्नर साहब के स्थगन आदेशों के बीच अलग ही मुकाबला चल रहा है। पिछले दिनों अवैध रूप से पटाखों का कारोबार करने वाले एक कारोबारी के खिलाफ कलेक्टर साहब ने कार्रवाई का आदेश दिया। कारोबारी ने देर नहीं की और मामला लेकर एडिशनल कमिश्नर की अदालत पहुंच गया। वहां से उसे तत्काल स्टे मिल गया। यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले कलेक्टर साहब ने अरबों रुपये कीमत की जमीन को सरकारी घोषित कर संबंधित संस्था से वापस लेने की कार्रवाई शुरू की थी।
लेकिन यह मामला भी एडिशनल कमिश्नर की अदालत पहुंचा और वहां उस पर भी स्टे ले लिया गया। अब कलेक्टर साहब के आदेशों का हश्र देखकर जिले के प्रशासनिक अमले में भी सवाल उठने लगे हैं। वैसे एडिशनल कमिश्नर साहब का राजस्व मामलों में पुराना रिकॉर्ड भी कुछ दिलचस्प रहा है। जब वे एक छोटे जिले के कलेक्टर हुआ करते थे, तब सरकारी जमीन को निजी घोषित करने का मामला सामने आया था। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंच से ही उन्हें हटाने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू हुई, जो आज तक लंबित बताई जाती है। अब साहब एडिशनल कमिश्नर के पद पर हैं और राजस्व न्यायालय में बैठकर कलेक्टरों के आदेशों पर स्टे दे रहे हैं।
उनके बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि जब प्रमोशन की उम्मीद ही नहीं बचती तो फिर आदेशों और नाराजगियों की परवाह क्यों की जाए। जिले में कलेक्टर साहब की कार्रवाई के बाद लगातार अदालत से स्टे मिलने की स्थिति ने प्रशासनिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी है। अवैध पटाखों के कारोबार से जुड़े मामले से लेकर अरबों रुपये की जमीन को सरकारी घोषित करने की कार्रवाई तक, कई मामलों में कलेक्टर के आदेशों को चुनौती दी गई और स्थगन आदेश मिल गए। अब इस पूरे घटनाक्रम को लेकर प्रशासनिक अमले में भी सवाल उठने लगे हैं कि आखिर कलेक्टर के आदेशों का लगातार ऐसा हश्र क्यों हो रहा है।
- collector-orders-additional-commissioner-stay








