
भोपाल के ‘ब्यूरोक्रेसी कॉरिडोर’ में आजकल एक नया मुहावरा चल रहा है— “फाइलें भी कांप रही हैं और अफसर भी, क्योंकि साहब कैमरे के साथ आ रहे हैं!”
एक प्रमोटेड आईएएस साहब ने जिले में कदम क्या रखा, मानों प्रशासनिक व्यवस्था में ‘डिस्कवरी चैनल’ शुरू हो गया हो। साहब का प्रोटोकॉल थोड़ा हटके है, वे अधिकारियों को बुलाते नहीं, बल्कि उनके चैंबर में ‘दस्तक’ (और कैमरा) लेकर पहुँच जाते हैं।
संवैधानिक गरिमा या डिजिटल महिमा?
नौकरशाही के पुराने चावल (सीनियर आईएएस) इसे ‘एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म’ कह रहे हैं, जबकि कनिष्ठ अधिकारी इसे ‘रील-सुधार’ मान रहे हैं। साहब अपना बैग खुद उठाते हैं “यह ‘सादा जीवन-उच्च विचार” का उत्कृष्ट उदाहरण है, लेकिन पीछे चलती कैमरा टीम यह सुनिश्चित करती है कि यह ‘सादगी’ देश के कोने-कोने तक पहुँचे।
एक क्लर्क दूसरे से बोला: “भाई, कलेक्टर साहब आने वाले हैं, फाइलें तैयार रखो!”
दूसरा क्लर्क “फाइलें तो तैयार हैं, बस ये बताओ कि ‘फेस पाउडर’ लगा लूं क्या? सुना है साहब के साथ वाली टीम 4K में शूट करती है!”
‘सरप्राइज विजिट’ का मध्य प्रदेश में चारो और शोर मचा है।
प्रशासनिक शब्दावली में इसे “फील्ड विजिबिलिटी” कहते हैं, लेकिन साहब का अंदाज ऐसा है कि अब अधिकारी समय से पहले दफ्तर पहुँच रहे हैं। वजह अनुशासन की नहीं है, बल्कि यह डर है कि कहीं उनके खाली चैंबर की ‘सिनेमैटिक शॉट’ सोशल मीडिया पर वायरल न हो जाए।
ब्यूरोक्रेसी का नया कीवर्ड “कैमरा-सेंट्रिक गवर्नेंस”
जानकार बताते हैं कि साहब का यह ‘पुराना अंदाज’ है। पिछली पोस्टिंग में भी उन्होंने खूब ‘कवरेज’ बटोरी थी। अब इसे ‘सर्विस कंडक्ट रूल्स’ के दायरे में देखा जाए या ‘पर्सनल ब्रांडिंग’ के, यह तो वक्त बताएगा पर फिलहाल, जिले के अफसर फिर से एक बार टेंशन में हैं – काम के बोझ से नहीं, बल्कि लाइटिंग और एंगल सेट करने के चक्कर में ज्यादा हैरान है।
बड़े साहब “रुको, पहले कैमरामैन को लेंस बदलने दो, फिर ‘एक्शन’ बोलूंगा तब आप फाइल खोलना
बैग का बोझ हे, बड़े साहब आप अपना बैग खुद उठाते हैं। एक कनिष्ठ अधिकारी ने धीरे से कहा: “सर आपका बैग तो हल्का है, असली बोझ तो हम पर है… आपके पीछे ‘फ्रेम’ में जो आना पड़ता है।
बड़े साहब का यदि इस ‘कैमरा-कल्चर’ के साथ काम करना अच्छा है, तो जनता का काम हो रहा है, तो इसे “क्रिएटिव एडमिनिस्ट्रेशन” कहा जा सकता है। लेकिन अधिकारियों के बीच यह बेहद चर्चा का विषय बनी हुई है।
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