
दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चिंता जताई गई है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सवाल उठाया कि राजधानी की हवा लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रही है, ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियां प्रदूषण रोकने के लिए आखिर क्या कदम उठा रही हैं? दिल्ली की जहरीली हवा की तुलना रोजाना करीब 30 सिगरेट पीने जैसे जोखिम से की जा रही है। यह तुलना प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को दर्शाती है। सर्दियों के मौसम में दिल्ली की हवा में प्रदूषक तत्वों की मात्रा बढ़ने से सांस संबंधी समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं।
दिल्ली में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाएं शामिल हैं। प्रदूषण के बढ़ते स्तर के बीच सरकार की ओर से कई उपाय किए जा रहे हैं। इनमें प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) की जांच, पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रतिबंध, निर्माण गतिविधियों पर रोक, सड़कों की सफाई और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना शामिल है। इसके बावजूद राजधानी में वायु गुणवत्ता में सुधार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता ऐसे समय में सामने आई है, जब दिल्ली में प्रदूषण का स्तर लगातार लोगों के स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है। 6 नवंबर 2026 को दिल्ली का AQI सुबह 8 बजे 389 तक पहुंच गया, जबकि कई इलाकों में प्रदूषण का स्तर गंभीर श्रेणी में दर्ज किया गया। प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए GRAP के तहत उपाय लागू किए जा रहे हैं। अदालत की ओर से सरकार और संबंधित एजेंसियों से जवाबदेही की अपेक्षा की जा रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी कदम दिल्लीवासियों को जहरीली हवा से राहत दिला पाएंगे, या हर साल सर्दियों में प्रदूषण का संकट इसी तरह गहराता रहेगा?








