
संसद के मानसून सत्र के दौरान बुधवार को लोकसभा में Foreign Contribution Amendment Bill, 2026 को संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया गया। बिल को लेकर विपक्ष लगातार विरोध कर रहा था और सदन की कार्यवाही के दौरान भी जमकर हंगामा हुआ।
क्या है FCRA संशोधन बिल?
FCRA कानून भारत में विदेशी चंदे और विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों, संस्थाओं और NGOs के लिए नियम तय करता है। प्रस्तावित संशोधन में विदेशी फंड से जुड़े नियमों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए जाने हैं।
PRS Legislative Research के अनुसार, बिल में FCRA प्रमाणपत्र समाप्त होने की स्थिति में विदेशी फंड से बनाए गए संस्थान के assets पर असर पड़ने का प्रावधान है। वहीं, मौजूदा कानून में अधिकतम पांच साल की सजा के प्रावधान को घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव भी शामिल है।
विपक्ष ने क्यों जताई आपत्ति?
विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रस्तावित बदलाव NGOs और अल्पसंख्यक संस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं। विपक्ष की ओर से बिल को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए गए और इसे वापस लेने की मांग भी सामने आई।
वहीं, सरकार का कहना है कि FCRA के जरिए विदेशी फंडिंग पर निगरानी जरूरी है और इसका उद्देश्य देश के हितों की सुरक्षा तथा विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए बिल का बचाव किया।
अब JPC करेगी विस्तृत जांच
लोकसभा में बिल को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने का फैसला हुआ है। समिति बिल के प्रावधानों की विस्तार से जांच करेगी और अपनी सिफारिशें देगी। इसके बाद बिल की आगे की संसदीय प्रक्रिया तय होगी।
बिल को JPC के पास भेजे जाने का फैसला ऐसे समय हुआ है, जब संसद में विपक्ष और सरकार के बीच कई मुद्दों को लेकर गतिरोध बना हुआ है। ऐसे में समिति की जांच से सरकार और विपक्ष दोनों को बिल के प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा का मौका मिलेगा।
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