सरकारी सिस्टम का अजब खेल: न स्थाई मुखिया, न छुट्टी का सुख; फिर पुराने साहब के कंधों पर विभाग का बोझ।

कहते हैं कि किस्मत से कोई भाग नहीं सकता, और ऐसा ही कुछ आजकल मध्य प्रदेश के एक बड़े और संवेदनशील सरकारी विभाग में देखने को मिल रहा है। विभाग में इन दिनों मुखिया की कुर्सी को लेकर ऐसी ‘म्यूजिकल चेयर’ चल रही है कि अधिकारी खुद हैरान हैं। आलम यह है कि जो साहब जिम्मेदारी से बचने के लिए छुट्टी पर गए थे, किस्मत उन्हें वापस घुमा-फिराकर उसी कुर्सी पर ले आई है।

पूरा मामला एक महत्वपूर्ण विभाग की पदस्थापना से जुड़ा है। कहानी शुरू हुई तब, जब विभाग के नियमित मुखिया बीमारी के कारण लंबी छुट्टी पर चले गए। आनन-फानन में सरकार ने ‘लूप लाइन’ में तैनात एक अपर मुख्य सचिव (ACS) को इस विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया।

शुरुआत में तो साहब ने बड़ी फुर्ती दिखाई और फंड से जुड़ी पेंडिंग फाइलों को फटाफट निपटाया। लेकिन जैसे ही काम का दबाव बढ़ा, साहब ने भी कन्नी काट ली और खुद छुट्टी पर चले गए।

विभाग की स्थिति तब ‘अनाथ’ जैसी हो गई जब उनके बाद जिम्मेदारी संभालने वाले दूसरे ACS साहब ने भी कुछ ही दिनों में अवकाश ले लिया। विभाग बिना मुखिया के अधर में लटका ही था कि पहले वाले ACS साहब अपनी छुट्टी काटकर वापस लौटे। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि अब तक तो सरकार ने किसी स्थाई अधिकारी की नियुक्ति कर दी होगी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

जैसे ही साहब दफ्तर पहुंचे, सरकार ने उन्हें फिर से उसी विभाग का अतिरिक्त प्रभार थमा दिया। अब हालत यह है कि साहब बेमन से ही सही, लेकिन भारी मन और फाइलों के दबाव के साथ एक बार फिर विभाग की नैया पार लगाने में जुट गए हैं। प्रशासनिक गलियारों में अब बस एक ही चर्चा है—”लौटकर बुद्धू घर को आए!”

ब्यूरो रिपोर्ट, ब्रांडवाणी समाचार।

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gaurav singh rajput

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