2030 तक खत्म होगा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन, नासा ने शुरू की अंतिम तैयारी

दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला माने जाने वाले अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) का सफर अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और उसके अंतरराष्ट्रीय साझेदारों ने संकेत दिए हैं कि वर्ष 2030 तक ISS को सेवा से बाहर कर दिया जाएगा। करीब तीन दशकों से पृथ्वी की निचली कक्षा में सक्रिय यह स्टेशन वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी परीक्षणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का प्रतीक रहा है। हालांकि, इसकी बढ़ती उम्र और संरचनात्मक चुनौतियों के कारण इसे लंबे समय तक संचालित रखना कठिन होता जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार ISS के कई मॉड्यूल और सिस्टम अपनी निर्धारित आयु के करीब पहुंच चुके हैं। समय के साथ स्टेशन में तकनीकी खामियां, रखरखाव की बढ़ती जरूरतें और अंतरिक्षीय वातावरण से होने वाला नुकसान बड़ी चुनौती बन गए हैं। इन समस्याओं को पूरी तरह दूर करना न केवल जटिल है बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद महंगा साबित हो सकता है। इसी कारण नासा और अन्य साझेदार एजेंसियों ने स्टेशन को चरणबद्ध तरीके से सेवानिवृत्त करने की योजना बनाई है।

योजना के तहत ISS को अनियंत्रित रूप से पृथ्वी पर गिरने देने के बजाय नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कराया जाएगा। इसके लिए एक विशेष डी-ऑर्बिट मिशन तैयार किया जा रहा है, जिसकी मदद से स्टेशन को धीरे-धीरे कक्षा से नीचे लाया जाएगा। वायुमंडल में प्रवेश के दौरान स्टेशन का अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा, जबकि बचा हुआ मलबा प्रशांत महासागर के एक दूरस्थ क्षेत्र में गिराया जाएगा। यह क्षेत्र लंबे समय से अंतरिक्ष यानों और उपग्रहों के अवशेषों को सुरक्षित रूप से गिराने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया पर लगभग 9,500 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आ सकती है। नासा का मानना है कि यह कदम पृथ्वी पर लोगों और संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। ISS की विदाई के साथ ही अंतरिक्ष अनुसंधान का एक ऐतिहासिक अध्याय समाप्त होगा, लेकिन इसके स्थान पर निजी अंतरिक्ष स्टेशनों और नई पीढ़ी की कक्षीय प्रयोगशालाओं के विकास का रास्ता भी खुलेगा। आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी एजेंसियों और निजी कंपनियों की साझेदारी और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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gaurav singh rajput

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