
सार
हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति में शिंकुला दर्रे के पास स्थित गोमो रंजन पर्वत इन दिनों पर्यटकों के बीच नया आकर्षण बन गया है। करीब 16,580 फीट की ऊंचाई पर मौजूद यह विशाल चट्टानी पर्वत अपनी अनोखी आकृति के कारण ‘भगवान का सिंहासन’ या ‘गॉड थ्रोन’ के नाम से जाना जाता है। बेहतर सड़क संपर्क के बाद यहां पहुंचना आसान हुआ है और देश-विदेश से पर्यटक इस अनोखे पहाड़ी नजारे को देखने पहुंच रहे हैं।
विस्तार
दूर से सिंहासन जैसी दिखती है विशाल चट्टान
लाहुल-स्पीति की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित गोमो रंजन पर्वत अपनी अलग तरह की बनावट के कारण खास पहचान बना रहा है। यह एक विशाल चट्टान के रूप में खड़ा दिखाई देता है, जिसकी आकृति दूर से किसी सिंहासन जैसी नजर आती है।
स्थानीय लोगों के अनुसार इसी वजह से इसे ‘गॉड थ्रोन’ यानी भगवान का सिंहासन कहा जाता है। बौद्ध समुदाय के लिए इस पर्वत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी बताया जाता है। वहीं, हिंदू श्रद्धालु इसे भगवान शिव के सिंहासन के रूप में देखते हैं।
16,580 फीट ऊंचे शिंकुला के पास है गोमो रंजन
गोमो रंजन पर्वत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण शिंकुला दर्रे के पास स्थित है। शिंकुला दर्रा करीब 16,580 फीट की ऊंचाई पर है और यह लाहुल घाटी को लद्दाख की जंस्कार घाटी से जोड़ता है।
पहले इस इलाके तक पहुंचना आसान नहीं था। पर्यटकों को लंबे और कठिन रास्ते से होकर यहां पहुंचना पड़ता था। लेकिन सीमा सड़क संगठन यानी BRO की ओर से सड़क संपर्क बेहतर किए जाने के बाद इस पूरे क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
900 किलोमीटर का सफर हुआ काफी छोटा
पहले इन पहाड़ी इलाकों तक पहुंचने के लिए बारालाचा, लेह-लद्दाख और कारगिल होते हुए करीब 900 किलोमीटर का लंबा सफर करना पड़ता था। अब सड़क संपर्क बेहतर होने के बाद यह यात्रा करीब 8 से 10 घंटे में पूरी की जा सकती है।
BRO की सड़क परियोजनाओं ने दारचा-शिंकुला-जंस्कार मार्ग को पर्यटकों के लिए ज्यादा सुगम बनाया है। अब सैलानी दारचा-शिंकुला होते हुए जंस्कार और आगे लेह की ओर जा सकते हैं, जबकि वापसी में बारालाचा होकर मनाली पहुंच सकते हैं।
एडवेंचर और फोटोग्राफी के शौकीनों को खूब भा रहा
गोमो रंजन पर्वत खास तौर पर एडवेंचर प्रेमियों, ट्रैकर्स और फोटोग्राफी के शौकीनों को आकर्षित कर रहा है। ऊंचे पहाड़, खुला आसमान और आसपास का दुर्गम हिमालयी इलाका इसे ऑफबीट डेस्टिनेशन की तलाश करने वाले पर्यटकों के लिए खास बनाता है।
यहां पहुंचने वाले पर्यटक घंटों पहाड़ों और आसपास के प्राकृतिक नजारों को कैमरे में कैद कर रहे हैं। बेहतर सड़क सुविधा के कारण स्थानीय लोगों की आवाजाही भी बढ़ी है।
टेंट में रात बिताने का भी इंतजाम
गोमो रंजन के आसपास पर्यटकों के लिए टेंट में ठहरने की व्यवस्था भी उपलब्ध है। यहां रात रुकने के साथ खानपान की सुविधा भी मिलती है। यानी पर्यटक सिर्फ कुछ घंटे का सफर करके लौटने के बजाय पहाड़ों के बीच रात बिताने का अनुभव भी ले सकते हैं।
मनाली से करीब 155 किलोमीटर दूर
गोमो रंजन पर्वत तक मनाली से टैक्सी के जरिए पहुंचा जा सकता है। मनाली से दारचा होते हुए शिंकुला के रास्ते यह दूरी करीब 155 किलोमीटर बताई गई है।
रात रुकने के लिए दारचा, जिसपा, केलंग और सिस्सु जैसे स्थानों पर ठहरने की व्यवस्था मौजूद है। सड़क बेहतर होने के कारण पर्यटक सुबह मनाली से निकलकर गोमो रंजन घूमने के बाद शाम तक वापस मनाली लौटने की योजना भी बना सकते हैं।
पर्यटन को मिल सकता है नया पंख
गोमो रंजन पर्वत के लोकप्रिय होने से शिंकुला रूट पर पर्यटन को भी नया आयाम मिलने की उम्मीद है। BRO की ओर से सड़क संपर्क मजबूत किए जाने के बाद इस क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है।
लाहुल-स्पीति प्रशासन की ओर से भी शिंकुला क्षेत्र को नए पर्यटन स्थल के रूप में उभरता हुआ बताया गया है। आने वाले समय में यहां पर्यटन गतिविधियों के और बढ़ने की संभावना है।
4.4 किलोमीटर की सुरंग से बढ़ेगी कनेक्टिविटी
जंस्कार घाटी को मनाली से सालभर जोड़ने के लिए शिंकुला दर्रे में करीब 4.4 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण भी किया जा रहा है। इसके पूरा होने के बाद इस दुर्गम इलाके में सालभर कनेक्टिविटी बेहतर होने की उम्मीद है।
ऐसे में गोमो रंजन पर्वत और शिंकुला क्षेत्र आने वाले समय में हिमाचल के प्रमुख ऑफबीट पर्यटन स्थलों में अपनी जगह बना सकते हैं।
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