
नई दिल्ली/दतिया: मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर जारी उपचुनाव के बीच एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। एक तरफ जहां दतिया विधानसभा क्षेत्र में मतदान की प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी तरफ इसी सीट से पूर्व विधायक राजेंद्र भारती ने अपनी दोषसिद्धि पर रोक लगाने की मांग को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजेंद्र भारती की याचिका को स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश शासन, निर्वाचन आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को तय की है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से जारी उपचुनाव की प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगाई गई है।
दतिया के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को दिल्ली की विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने बैंक एफडी घोटाला मामले में 2 अप्रैल 2026 को 3 साल के कारावास की सजा सुनाई थी। इस सजा के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय द्वारा उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई थी, जिसके कारण दतिया सीट रिक्त घोषित हो गई। सीट खाली होने के बाद निर्वाचन आयोग ने दतिया में उपचुनाव की घोषणा की और आज 30 जुलाई को यहां मतदान कराया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट जाने से पहले राजेंद्र भारती ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपनी दोषसिद्धि पर स्थगन देने और दतिया उपचुनाव पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिल सकी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की। भारती ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 10 जुलाई को सुनाए गए उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें हाईकोर्ट ने विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट की ओर से सुनाई गई सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज जैन की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि सजा पर रोक लगाना एक असाधारण अधिकार है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ विशेष और असाधारण परिस्थितियों में ही होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी माना था कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में उसे कोई स्पष्ट गलती या बुनियादी कमी नजर नहीं आती। राजेंद्र भारती की इस दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया था कि दतिया विधानसभा में उपचुनाव होना उनके लिए एक अपूरणीय क्षति है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि यह समस्या सिर्फ भारती के सामने नहीं है, बल्कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने से जुड़े कानूनी प्रावधानों के कारण उत्पन्न हुई है। सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति एमएलए या एमपी है और उसकी राजनीतिक स्थिति पर असर पड़ रहा है, सजा पर रोक लगाने का आधार नहीं बन सकता। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है और अगली सुनवाई में सभी पक्षों के जवाब पेश होने के बाद आगे का फैसला लिया जाएगा।
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