भ्रष्टाचार की ‘गारंटी’ या अफसरों का ‘खेल’? शहपुरा ROB हादसे की आरोपी कंपनी ICT को MPRDC ने दिए 8 करोड़ से अधिक के नए ठेके, जनता के पैसों पर भारी चपत!

FIR दर्ज होने और ब्लैकलिस्ट की प्रक्रिया के बीच मेसर्स ICT प्रा. लि. पर फिर मेहरबान हुए अफसर; कम बोली लगाने वाली कंपनियों को दरकिनार कर सरकार को पहुँचाया ~2.6 करोड़ का चूना।

मध्य प्रदेश में विकास के दावों और प्रशासनिक पारदर्शिता की पोल खोलता हुआ एक और बड़ा मामला सामने आया है। म.प्र. रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPRDC) के अफ़सरों और दागी ठेकेदारों के बीच का गठजोड़ अब खुलकर जनता के सामने आ चुका है। जिस कंपनी की घोर लापरवाही के कारण शहपुरा रेलवे ओवरब्रिज (ROB) का हिस्सा ताश के पत्तों की तरह ढह गया, उसी दोषी कंपनी पर MPRDC के अफ़सरों ने एक बार फिर खजाना लुटा दिया है। 

मामला भोपाल-जबलपुर एनएच पर शहपुरा रेलवे ओवरब्रिज (ROB) के ढहने से जुड़ा है। 23 फरवरी 2026 को मीडिया में खबर उजागर होने के बाद सरकार ने आनन-फानन में सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे। MPRDC ने निर्माण करने वाली कंपनी मेसर्स वागड़ इन्फ्रा और देख-रेख (कंसलटेंसी) करने वाली कंपनी मेसर्स आई.सी.टी. प्रा. लि. (M/s ICT Pvt. Ltd.) पर FIR दर्ज कराई और आई.सी.टी. को ब्लैकलिस्ट करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया। 

इतना ही नहीं, सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) की रिपोर्ट में भी साफ हो गया कि निर्माण में बेहद घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया था और गुणवत्ता के नियमों की धज्जियां उड़ाई गई थीं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह सब केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक नाटक था? 

कागजों पर तो ब्लैकलिस्टिंग और कार्रवाई का ढोल पीटा गया, लेकिन पर्दे के पीछे अफ़सरों और कंपनी की सांठगांठजारी रही। जिस कंपनी पर FIR दर्ज थी, उसी मेसर्स आई.सी.टी. प्रा. लि. को MPRDC ने 07 मई 2026 और 04 जून 2026 को दो बड़े और महत्वपूर्ण कार्यों के कार्यादेश सौंप दिए! 

इनमें उज्जैन-जावरा ग्रीनफील्ड हाईवे और राज्य के अन्य ओ.एम.टी. (OMT) कार्यों की देख-रेख शामिल है। 

नियमों को ताक पर रखकर सरकार को 2.6 करोड़ का चूना

ब्रांडवाणी समाचार की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि इस मेहरबानीके लिए अफ़सरों ने निविदा (Tender) के नियमों में जमकर धांधली की: 

· न्यूनतम बोली को ठुकराया: निविदा में अन्य कंपनियों ने लगभग 5.5 करोड़ रुपये की कम बोली लगाई थी। इसके बावजूद, अफ़सरों ने अधिक बोली लगाने वाली आरोपी कंपनी मेसर्स आई.सी.टी. को 8.34 करोड़ रुपये में काम आवंटित कर दिया। इससे राज्य के खजाने को सीधे लगभग 2.6 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति पहुँचाई गई। 

· कंपनी के हिसाब से बदलीं शर्तें: केवल मेसर्स आई.सी.टी. को ही फायदा पहुँचाने के लिए निविदा में टर्नओवर की शर्त को सामान्य 2% से बढ़ाकर सीधे 200 करोड़ रुपये कर दिया गया, जो देश की गिनती की ही कंपनियों के पास है। 

· मुख्य सचिव की मंजूरी से बचने का खेल: अफ़सरों ने जानबूझकर रेट्स को 10 करोड़ से कम रखवाया ताकि फाइल अनुमोदन के लिए मुख्य सचिव तक न पहुँचे और खेल विभागीय स्तर पर ही रफा-दफा हो जाए। 

जब CRRI की रिपोर्ट घटिया निर्माण की तस्दीक कर रही है, जब खुद विभाग ने FIR दर्ज कराई है, तो फिर किस मजबूरी या कमिशनके चलते उसी दागी कंपनी की झोली में नए करोड़पति ठेके डाले जा रहे हैं? 

क्या MPRDC के अफ़सरों के लिए जनता की जान-माल की सुरक्षा से ज्यादा अहम भ्रष्ट ठेकेदारों के हित हैं? सरकार को यह साफ करना होगा कि यह केवल अफ़सरों का भ्रष्टाचार है या फिर इसमें ऊपर तक की मूक सहमति शामिल है। 

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gaurav singh rajput

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