
अधिकारों के लिए लड़ने वाला कोई दूसरा इंसान पैदा नहीं होगा। जागिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।आज हम किसी राजनीतिक दंगल की बात नहीं करेंगे, आज हम बात करेंगे इस देश के लोकतंत्र की उस ठंडी पड़ चुकी नब्ज़ की, जिसे अब न तो सरकार की संवेदनहीनता हिला पा रही है और न ही इस देश की अंधी-बहरी जनता का ज़मीर।
सोनम वांगचुक नहीं रहे? यह सवाल सिर्फ एक इंसान की शारीरिक मौजूदगी पर नहीं है, यह सवाल इस देश के नीति-निर्माताओं की अंतरात्मा के मर जाने पर है! लद्दाख की बर्फीली वादियों से लेकर देश की राजधानी तक, जो शख्स महीनों से भूख, प्यास और कड़कड़ाती ठंड में सिर्फ लद्दाख की सुरक्षा, वहां के पर्यावरण और छठी अनुसूची की मांग को लेकर अनशन पर बैठा रहा, आज उसे इस हाल में ला खड़ा किया गया है।
सबसे पहला तीखा हमला इस देश की सोई हुई सरकार पर। हुक्मरानों, तुम्हारी आँखों का पानी कब मरेगा? लद्दाख का वो पर्यावरणविद्, जिसने देश को सेना के लिए सौर-ऊर्जा से चलने वाले टेंट दिए, जिसने पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनी पूरी जिंदगी झोंक दी, वो हफ़्तों-महीनों तक अनशन (Hunger Strike) पर बैठा रहता है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। क्या सरकार सिर्फ बड़े-बड़े उद्योगपतियों के मुनाफे की चिंता करेगी? क्या लद्दाख के पहाड़ों को खोखला करने की कॉर्पोरेट साजिशों को छिपाने के लिए एक सच्चे देशभक्त की आवाज को घोंटा जा रहा है?
प्रधानमंत्री जी, आप मन की बात में देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी बात का जिक्र करते हैं। आप दुनिया भर में शांति और विकास का मसीहा बनने का दावा करते हैं। लेकिन जब आपके अपने देश का एक रत्न, सोनम वांगचुक, लद्दाख के वजूद को बचाने के लिए तड़प रहा होता है, तब आपकी यह रहस्यमयी चुप्पी क्या बयां करती है? क्या एक संवेदनशील प्रधानमंत्री को अपने ही देश के नागरिक की जान की भीख मांगती आवाज सुनाई नहीं देती? क्या सत्ता की हठधर्मिता इतनी बड़ी हो गई है कि लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन करने वालों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए? इतिहास इस चुप्पी का हिसाब जरूर मांगेगा।
इस बर्बादी के लिए सिर्फ सरकार या प्रधानमंत्री जिम्मेदार नहीं हैं। सबसे बड़ी गुनहगार इस देश की जनता है! हाँ, आप और हम! हम वो जनता हैं जो रील्स और सोशल मीडिया के फूहड़ तमाशे देखने में घंटों बर्बाद कर सकती है, जो सीमा पर रील बनाने वाले नकली राष्ट्रवादियों पर तालियां पीटती है। लेकिन जब एक असली देशभक्त अपनी जान की बाजी लगाकर देश के भूगोल और पर्यावरण को बचाने के लिए भूखा सोता है, तो हमारी उंगलियां सिर्फ ‘RIP’ या ‘नहीं रहे?’ जैसे कीवर्ड सर्च करने के लिए चलती हैं।
हम डिजिटल युग के वो लाश बन चुके नागरिक हैं, जिन्हें फर्क ही नहीं पड़ता कि देश का भविष्य किस गर्त में जा रहा है। जब तक विपदा हमारे अपने घर के दरवाजे पर दस्तक नहीं देती, तब तक हम स्टेटस लगाने और तमाशा देखने के अलावा कुछ नहीं करते। सोनम वांगचुक के इस संघर्ष की उपेक्षा करके, इस देश की जनता ने साबित कर दिया है कि वह एक जीवित समाज नहीं, बल्कि संवेदनहीन लोगों का हुजूम बन चुकी है।
‘ब्रांडवाणी समाचार’ आज सीधे शब्दों में चेतावनी दे रहा है—अगर आज सोनम वांगचुक की आवाज को सत्ता के अहंकार और जनता की चुप्पी ने मिलकर दबा दिया, तो आने वाले कल में इस देश में जल, जंगल, जमीन और जनता के
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