
नई दिल्ली/काठमांडू:4 जुलाई 2026 से शुरू होने जा रही कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत-नेपाल के बीच एक बार फिर कूटनीतिक तनाव देखने को मिला है। नेपाल सरकार ने लिपुलेख (उत्तराखंड) रूट के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन को औपचारिक कूटनीतिक पत्र भेजा है।
नेपाल ने दावा किया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र उसके संप्रभु भू-भाग का हिस्सा हैं और यह 1816 की सुगौली संधि के अनुसार नेपाल में आते हैं। नेपाल का कहना है कि इस क्षेत्र से होकर यात्रा या व्यापार उसकी सहमति के बिना नहीं होना चाहिए। वहीं भारत की ओर से इस रूट को लंबे समय से प्रयुक्त पारंपरिक मार्ग बताया गया है।
भारत ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख पास से कैलाश मानसरोवर यात्रा दशकों से संचालित होती रही है और यह कोई नई व्यवस्था नहीं है। विदेश मंत्रालय के अनुसार इस बार 10 बैचों में करीब 500 तीर्थयात्रियों को लिपुलेख मार्ग से यात्रा की अनुमति दी गई है। इस विवाद के बीच भारत ने नेपाल के दावों को ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न बताते हुए खारिज किया है। भारत का कहना है कि यह क्षेत्रीय दावे “एकतरफा और आधारहीन” हैं।
गौरतलब है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदू, बौद्ध और जैन श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है और हर साल हजारों यात्री इस कठिन हिमालयी मार्ग से यात्रा करते हैं। इस वर्ष यात्रा जून से अगस्त के बीच आयोजित की जा रही है और इसमें दो प्रमुख रूट—लिपुलेख और नाथूला शामिल हैं।
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