
बाराबंकी के रुदौली से निकले खुमार बाराबंकवी ने अपनी शायरी से मुशायरों में पहचान बनाई और फिर फिल्म ‘शाहजहां’ के गीत ‘चाह बर्बाद करेगी’ से बॉलीवुड में मशहूर हो गए। केएल सहगल की आवाज में यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों के लिए गीत लिखे, लेकिन बाद में फिल्मों में शायरी के बदलते स्तर से निराश होकर फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली। 1986 में ‘लव एंड गॉड’ के लिए गीत लिखना उनका आखिरी फिल्मी काम रहा।
बाराबंकी से निकला शायरी का सितारा
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रुदौली में 1919 में जन्मे खुमार बाराबंकवी का असली नाम मोहम्मद हैदर खान था। उनके परिवार में शायरी और कविता का माहौल था। पिता, चाचा और भाई भी शेर-ओ-शायरी से जुड़े थे। इसी माहौल में खुमार के भीतर भी शायरी के प्रति लगाव बढ़ता गया।
कहा जाता है कि लखनऊ में एक प्रेम प्रसंग के बाद उनकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि उन्होंने पढ़ाई से दूरी बना ली और पूरी तरह शायरी में रम गए। हालांकि, उनकी निजी प्रेम कहानी के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनकी शायरी में जिंदगी, प्रेम और निजी भावनाओं की गहरी छाप दिखाई देती थी।
मुशायरे से पहुंची मुंबई तक आवाज
1945 में खुमार बाराबंकवी मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए मुंबई पहुंचे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात फिल्म जगत से हुई। फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार ने उनका कलाम सुना और प्रभावित होकर उन्हें अपनी फिल्म ‘शाहजहां’ के लिए गीत लिखने का मौका दिया।
यह मौका खुमार के फिल्मी सफर का बड़ा मोड़ साबित हुआ। फिल्म के लिए उन्होंने ‘चाह बर्बाद करेगी’ और ‘ऐ दिल-ए-बेकरार’ जैसे गीत लिखे। इन गीतों को केएल सहगल ने अपनी आवाज दी थी। खास तौर पर ‘चाह बर्बाद करेगी’ ने खुमार को फिल्मी दुनिया में पहचान दिला दी।
एक गीत ने दिलाई बड़ी पहचान
‘चाह बर्बाद करेगी’ की सफलता के बाद खुमार बाराबंकवी के लिए फिल्मों के दरवाजे खुल गए। उन्होंने आगे ‘साज और आवाज’, ‘हलचल’, ‘रुखसाना’, ‘मेहंदी’ और ‘लव एंड गॉड’ जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे।
उनकी शायरी की खासियत यह थी कि उसमें सिर्फ प्रेम या रोमांस नहीं, बल्कि जिंदगी के अनुभव और भावनाओं की गहराई भी दिखाई देती थी। यही वजह रही कि फिल्मी गीतों के साथ-साथ मुशायरों में भी उनकी अलग पहचान बनी रही।
फिर बॉलीवुड से क्यों बनाई दूरी?
शोहरत मिलने के बाद भी खुमार बाराबंकवी लंबे समय तक फिल्म इंडस्ट्री में नहीं टिके। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, फिल्मों में शायरी के बदलते और गिरते स्तर से वह निराश थे। उन्हें लगता था कि फिल्मी दुनिया में वह शायरी की गहराई और गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
इसके अलावा उन्हें मुशायरों का माहौल अधिक पसंद था। इसी कारण उन्होंने लंबे समय तक फिल्मों के लिए गीत लिखने से दूरी बनाए रखी। रेख्ता के अनुसार, मुंबई के माहौल और 1947 के दंगों से भी वह परेशान हुए और बाद में उत्तर भारत लौट गए।
नौशाद के कहने पर लौटे, फिर हमेशा के लिए विदा
खुमार बाराबंकवी ने करीब दो दशक तक फिल्मों के लिए गीत नहीं लिखे। हालांकि, 1986 में संगीतकार नौशाद के आग्रह पर उन्होंने ‘लव एंड गॉड’ के लिए गीत लिखे। इसके बाद उन्होंने फिल्मी गीत लेखन से पूरी तरह दूरी बना ली। यही उनका आखिरी फिल्मी काम माना जाता है।
फिल्मों से दूर रहने के बावजूद उनकी शायरी की लोकप्रियता बनी रही। उनकी गजलों में जिंदगी के अनुभव, प्रेम, जुदाई और इंसानी भावनाओं की गहराई देखने को मिलती है। उनके कई अशआर आज भी मुशायरों और साहित्यिक मंचों पर याद किए जाते हैं।
80 साल की उम्र में हुआ निधन
खुमार बाराबंकवी का निधन 20 फरवरी 1999 को बाराबंकी में 80 वर्ष की उम्र में हुआ। उन्होंने फिल्मों में अपेक्षाकृत कम काम किया, लेकिन जिस दौर में उन्होंने फिल्मी गीत लिखे, उसमें उनकी शायरी ने अलग पहचान बनाई। एक सफल फिल्मी गीतकार बनने के बाद भी उन्होंने अपनी प्राथमिकता मुशायरों और शायरी को बनाया और अंततः बॉलीवुड से दूरी बना ली।
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