
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा राज्य में प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण और कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बेहद सराहनीय और कड़ा कदम उठाया गया है। सरकार द्वारा तय की गई नई स्थानांतरण नीति के तहत अधिकारियों एवं कर्मचारियों के तबादलों के लिए 1 जून से 15 जून तक की समय-सीमा निर्धारित की गई थी, जिसे आगे न बढ़ाने का मुख्यमंत्री का निर्णय राज्य के व्यापक हित में एक मील का पत्थर साबित होगा।
अक्सर यह देखा जाता रहा है कि स्थानांतरण सत्र के दौरान शासकीय विभागों में प्रशासनिक कार्य ठप पड़ जाते हैं। अधिकारी और कर्मचारी अपने मूल कर्तव्यों को छोड़कर महीनों तक मंत्रियों और रसूखदारों के बंगलों के चक्कर काटने लगते हैं, ताकि उन्हें मनचाही या मलाईदार जगहों पर पदस्थापना मिल सके। इस ‘तबादला उद्योग’ और सिफारिशी संस्कृति के कारण आम जनता के जरूरी काम लंबित हो जाते हैं और पूरी व्यवस्था पंगु नजर आने लगती है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने समय-सीमा को सख्ती से लागू रख कर इस अवांछित प्रक्रिया पर पूरी तरह विराम लगा दिया है। उनका यह निर्णय स्पष्ट करता है कि मध्य प्रदेश में अब केवल ‘काम की संस्कृति’ चलेगी, न कि ‘परिक्रमा की संस्कृति’।
डॉ. मोहन यादव एक उच्च शिक्षित और दूरदर्शी राजनेता हैं। उनके इस त्वरित और दृढ़ निर्णय से यह साफ हो गया है कि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के, प्रदेश हित को सर्वोपरि रखते हैं। स्थानांतरण की खिड़की को केवल 15 दिनों तक सीमित रखना और उसे आगे विस्तारित न करना यह दर्शाता है कि मुख्यमंत्री शासन-प्रशासन में पूर्ण अनुशासन और जवाबदेही चाहते हैं।
इस कड़े निर्णय से शासकीय सेवक अब अपना पूरा ध्यान जनता की समस्याओं के निराकरण और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन पर केंद्रित कर सकेंगे। मुख्यमंत्री का यह कार्य न केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से उत्कृष्ट है, बल्कि आम नागरिकों के समय और संसाधनों की बचत करने वाला भी है।
प्रबुद्ध वर्ग और जनता को पूरी उम्मीद है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भविष्य में भी मध्य प्रदेश के चहुंमुखी विकास और सुशासन के लिए इसी प्रकार के कड़े, निष्पक्ष और सराहनीय निर्णय लेते रहेंगे।
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