
मध्य प्रदेश में नौकरशाही अब जनसेवा का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसा अभेद्य किला बन गई है जहाँ शिकायतों की गूंज दीवारों से टकराकर दम तोड़ देती है। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि सूबे के बड़े ‘साहबों’ (IAS, IPS, SAS, SPS) के खिलाफ शिकायतों का अम्बार लग चुका है। दिल्ली के प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और राष्ट्रपति भवन तक गुहार लगाई गई, लेकिन मजाल है कि प्रदेश के इन ‘आधुनिक राजाओं’ पर जूं तक रेंगी हो।
राष्ट्रपति की चिट्ठी भी रद्दी के भाव!
हैरानी की बात यह है कि जिन शिकायतों को देश की सर्वोच्च सत्ता—राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय—ने गंभीरता से लेकर जांच के लिए राज्य सरकार को भेजा, वे यहाँ आते ही ‘फाइलों के कब्रिस्तान’ में दफन हो गईं। साल 2025 में आला अफसरों के खिलाफ 144 गंभीर शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन समाधान? शून्य! ऐसा लगता है कि राज्य का सिस्टम इन अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के बजाय उन्हें ‘कवच’ प्रदान करने में जुटा है।
लोकतंत्र के ‘नए राजा’: जवाबदेही से कोसों दूर
आज का परिदृश्य देखकर लगता है कि ये अधिकारी खुद को जनता का सेवक नहीं, बल्कि किसी रियासत का महाराजा समझते हैं।
- शाही अंदाज़: शिकायतों की लिस्ट लंबी होती जा रही है, लेकिन ये अफसर अपनी एयर-कंडीशंड गाड़ियों और आलीशान बंगलों में बैठकर निश्चिंत हैं।
- नियमों की धज्जियां: सीपी ग्राम्स (CPGRAMS) जैसे पोर्टल इसलिए बनाए गए थे ताकि भ्रष्टाचार और लापरवाही पर लगाम लगे, लेकिन यहाँ तो पोर्टल ही बेअसर साबित हो रहा है।
- जांच का ढोंग: कागजों पर जांच की बात तो होती है, लेकिन हकीकत में फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक जाते-जाते दम तोड़ देती हैं।
कर्मचारी चयन और आयोगों का बुरा हाल
सिर्फ बड़े साहब ही नहीं, बल्कि कर्मचारी चयन मंडल और लोक सेवा आयोग जैसे संस्थानों पर भी शिकायतों की बाढ़ है। हज़ारों युवा अपने भविष्य के लिए गुहार लगा रहे हैं, ईडब्ल्यूएस (EWS) प्रमाण पत्र के लिए लोग भटक रहे हैं, लेकिन प्रशासन की कछुआ चाल ये बताने के लिए काफी है कि उन्हें आम आदमी की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं है।
बड़ा सवाल: न्याय कब?
जब देश के सबसे बड़े कार्यालयों के हस्तक्षेप के बाद भी शिकायतों का ‘निराकरण’ नहीं होता, तो आम आदमी किसके दरवाजे पर जाए? क्या ये अधिकारी संविधान से भी ऊपर हो गए हैं? जिस तेज़ी से इन शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाला गया है, वह साफ दर्शाता है कि ‘रक्षक ही भक्षक’ वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही है।
“जब साहबों की कुर्सी को शिकायतों का डर ही नहीं रहेगा, तो जनता की सुनवाई केवल एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगी।”









