
नई दिल्ली। सूचना के अधिकार (RTI) की आड़ में सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने और सरकारी कर्मचारियों के कार्य में हस्तक्षेप करने के आरोपी एक RTI कार्यकर्ता को सर्वोच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि आज के समय में “RTI एक्टिविज्म एक नया कारोबार बन गया है।” न्यायालय की यह टिप्पणी कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है।
मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने की। याचिकाकर्ता राकेश कुमार बहल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि सड़क निर्माण जैसे सरकारी विकास कार्यों की निगरानी और हस्तक्षेप करने का अधिकार एक स्वयंभू RTI कार्यकर्ता को कैसे मिल सकता है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार द्वारा स्वीकृत और वित्तपोषित परियोजनाओं की निगरानी के लिए संबंधित एजेंसियां मौजूद हैं।
एफआईआर के अनुसार आरोप है कि याचिकाकर्ता और अन्य व्यक्तियों ने सड़क निर्माण कार्य में बाधा उत्पन्न की तथा मौके पर मौजूद श्रमिकों के खिलाफ कथित रूप से जातिसूचक टिप्पणियां भी कीं। इसी आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। जांच एजेंसियों का कहना है कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और मामले में विस्तृत जांच आवश्यक है।
इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया सरकारी कार्य में बाधा डालने और याचिकाकर्ता की प्रत्यक्ष भूमिका की ओर संकेत करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निष्कर्षों से सहमति जताते हुए अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत के इस फैसले को RTI के वैध उपयोग और उसकी सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि सूचना के अधिकार का उपयोग जनहित के लिए होना चाहिए, न कि सरकारी कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप के साधन के रूप में।
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