मध्य प्रदेश में गहराया कैंसर दवाओं का संकट, इराक-ईरान तनाव का सीधा असर, क्या मोहन सरकार पेश करेगी इंसानियत की मिसाल या चुनावी दांव तक सीमित रहेगी राहत?

मध्य प्रदेश से इस वक्त एक बेहद संवेदनशील और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। प्रदेश में इस समय लगभग 1.60 लाख कैंसर पीड़ित हैं, जिनमें से करीब 70 फीसदी मरीजों को अपनी जान बचाने के लिए कीमोथेरेपी की सख्त जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, प्रदेश में कीमोथेरेपी की दवाओं का स्टॉक लगभग खत्म होने की कगार पर है।

इराक और ईरान के बीच चल रहे वैश्विक संघर्ष का सीधा असर अब हमारे देश और प्रदेश के स्वास्थ्य सिस्टम पर पड़ने लगा है। कच्चे माल की कमी के चलते इन जीवन रक्षक दवाओं के दाम 50 फीसदी तक बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

अब सवाल सूबे की मोहन सरकार पर उठ रहे हैं। क्या सरकार इन दवाओं के बढ़ते दामों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी? चुनावी रैलियों और मुफ्त की योजनाओं पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली सरकार क्या इस गंभीर संकट के समय कैंसर मरीजों को दवाओं पर सब्सिडी देकर कोई राहत पहुंचाएगी? क्या सच में समाज को इंसानियत की एक मिसाल देखने को मिलेगी या फिर ये मुद्दा भी सिर्फ चुनावी वादों की भेंट चढ़ जाएगा? आइए देखते हैं इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट में…”

भोपाल। मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर इराक और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का सीधा और बेहद दर्दनाक असर अब मध्य प्रदेश के कैंसर मरीजों पर पड़ता दिख रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में इस समय लगभग 1 लाख 60 हजार कैंसर मरीज हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत को नियमित अंतराल पर कीमोथेरेपी की आवश्यकता होती है। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि अस्पतालों और बाजारों से कीमोथेरेपी की दवाओं का स्टॉक लगभग खत्म हो चुका है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल (API) की आपूर्ति बाधित होने के कारण इन दवाओं की कीमतों में 50 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी की आशंका है। एक तरफ जहां मरीज पहले से ही इस जानलेवा बीमारी के महंगे इलाज से आर्थिक रूप से टूट चुके हैं, वहीं दवाओं के दाम आधे बढ़ जाना उनके लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है।

इस संकट ने राज्य की मोहन यादव सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार चुनाव जीतने के लिए ‘फ्री’ की रेवड़ियां और लोकलुभावन योजनाएं धड़ल्ले से चला रही है, लेकिन जब बात वास्तव में जिंदगी और मौत से जूझ रहे नागरिकों की आती है, तो सरकारी खजाना खाली नजर आता है।

 

जनता की मांग: “क्या सरकार इन दवाओं की कालाबाजारी और बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए कोई सख्त कदम उठाएगी? क्या चुनावी चश्मे से बाहर निकलकर, इन जीवन रक्षक दवाओं पर भारी सब्सिडी देकर सरकार प्रदेश और देश के सामने इंसानियत की एक सच्ची मिसाल पेश करेगी?”

विशेषज्ञों और स्वास्थ्य विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में संवेदनशील है, तो उसे तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

दवाओं पर आपातकालीन सब्सिडी: सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर कीमोथेरेपी की दवाओं पर टैक्स कम करना चाहिए और राज्य कोष से सब्सिडी देकर मरीजों को पुरानी दरों पर ही दवाएं उपलब्ध करानी चाहिए।

बफर स्टॉक का निर्माण: केंद्र सरकार के समन्वय से राज्य के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में दवाओं का आपातकालीन बफर स्टॉक तैयार किया जाए ताकि गरीब मरीजों का इलाज न रुके।

दाम नियंत्रण नीति: ड्रग कंट्रोलर के माध्यम से स्थानीय स्तर पर दवाओं की जमाखोरी और मनमाने दामों पर बेचे जाने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन किसी भी कल्याणकारी राज्य की असली परीक्षा संकट के समय होती है। मध्य प्रदेश के 1.60 लाख कैंसर मरीजों और उनके परिवारों की निगाहें इस समय मुख्यमंत्री मोहन यादव पर टिकी हैं। अब यह देखना होगा कि सरकार केवल चुनावी प्रबंधन में जुटी रहती है या फिर इन मासूम जिंदगियों को बचाने के लिए ‘इंसानियत की मिसाल’ पेश करती है।

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gaurav singh rajput

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