
उज्जैन, 5 अक्टूबर 2026। ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर की परंपराओं के अनुसार आने वाले तीन महीने उज्जैन के लिए धार्मिक दृष्टि से खास रहेंगे। अश्विन से मार्गशीर्ष तक भगवान महाकाल छह बार चांदी की पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण करेंगे। विजयादशमी पर बाबा महाकाल दशहरा मैदान पहुंचकर शमी पूजन करेंगे, जबकि वैकुंठ चतुर्दशी पर गोपाल मंदिर में हरि-हर मिलन की परंपरा निभाई जाएगी। कार्तिक और अगहन मास की सवारियों में शिप्रा तट पर तीर्थपूजन भी होगा।
विजयादशमी पर दशहरा मैदान पहुंचेंगे बाबा महाकाल
भगवान महाकाल की सवारियों की परंपरा श्रावण-भाद्रपद तक ही सीमित नहीं है। विजयादशमी, कार्तिक और अगहन मास में भी विशेष अवसरों पर बाबा महाकाल नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस वर्ष अश्विन से मार्गशीर्ष तक ऐसे छह अवसर निर्धारित हैं।
इनमें 20 अक्टूबर 2026 की विजयादशमी की सवारी विशेष मानी जा रही है। इस दिन भगवान महाकाल फ्रीगंज क्षेत्र में प्रवेश कर दशहरा मैदान पहुंचेंगे। यहां शमी वृक्ष का पूजन किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार शमी को विजय, शक्ति और मंगल का प्रतीक माना जाता है। उज्जैन में भगवान महाकाल को नगर का अधिपति मानने की परंपरा के चलते विजयादशमी की यह सवारी विशेष महत्व रखती है।
वैकुंठ चतुर्दशी पर होगा हरि-हर मिलन
कार्तिक मास की सवारी में वैकुंठ चतुर्दशी का विशेष महत्व रहेगा। 23 नवंबर 2026 की रात भगवान महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर पहुंचेगी, जहां हरि-हर मिलन की परंपरा निभाई जाएगी। मंदिर की परंपरा के अनुसार यह आयोजन भगवान शिव और भगवान विष्णु के मिलन का प्रतीक माना जाता है।
कार्तिक और अगहन मास में निकलने वाली सवारियां शिप्रा तट पर होने वाले तीर्थपूजन से भी जुड़ी हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन महीनों में स्नान, दान और तीर्थपूजन का विशेष महत्व माना जाता है। इसी परंपरा के तहत भगवान महाकाल की सवारी शिप्रा तट तक पहुंचती है।
महाकाल की सवारियों की प्रमुख तिथियां
- 20 अक्टूबर: विजयादशमी की सवारी और दशहरा मैदान में शमी पूजन
- 16 नवंबर: कार्तिक मास की पहली सवारी
- 23 नवंबर: कार्तिक मास की दूसरी सवारी
- 23 नवंबर: वैकुंठ चतुर्दशी पर हरि-हर मिलन
- 30 नवंबर: मार्गशीर्ष की पहली सवारी
- 7 दिसंबर: मार्गशीर्ष की दूसरी सवारी
इन सवारियों से पहले 12 अक्टूबर को उमा माता की सवारी भी निकलेगी। उमा माता चांदी की पालकी में रामघाट पहुंचेंगी, जहां उमा सांझी उत्सव के समापन पर शिप्रा नदी में सांझी का विसर्जन होगा। यह सवारी मंदिर की परंपरा में वर्ष में एक बार निकलती है।
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