मध्य प्रदेश में ‘सिस्टम’ की जकड़ में व्यापार: फाइलों के फेर में उलझती उन्नति, क्या सुनेंगे सीएम मोहन यादव?

मध्य प्रदेश को ‘विकसित राज्य’ बनाने के दावे तो बड़े-बड़े किए जा रहे हैं, लेकिन क्या ज़मीनी हकीकत इन दावों के साथ कदम मिला पा रही है? प्रदेश का व्यापारी वर्ग आज खुद को एक ऐसी चक्रव्यूह में फंसा हुआ महसूस कर रहा है, जहाँ विकास की फाइलें अधिकारियों की मेजों पर धूल फांक रही हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यकाल में जहाँ एक ओर निवेश लाने की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय व्यापारियों का आरोप है कि नौकरशाही और प्रशासनिक अड़ंगेबाजी ने उनके व्यापार की कमर तोड़ दी है।

मध्य प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले व्यापारियों का दर्द अब छलकने लगा है। आरोप है कि प्रदेश का ‘अधिकारी वर्ग’ हर छोटी-बड़ी प्रक्रिया में रोड़ा अटकाने का काम कर रहा है। लाइसेंस से लेकर परमिट तक और मंजूरी से लेकर भुगतान तक, हर कदम पर व्यापारियों को ‘लालफीताशाही’ (Red Tape) का सामना करना पड़ रहा है।

  • अड़ंगेबाजी का आलम:फाइलों को बिना किसी ठोस कारण के महीनों तक अटकाना।
  • प्रशासनिक उदासीनता:अधिकारियों द्वारा काम को गति देने के बजाय नियम-कायदों का डर दिखाकर काम रोकना।
  • आर्थिक नुकसान:समय पर काम न होने के कारण व्यापारियों पर बढ़ता कर्ज और ब्याज का बोझ।
  • हतोत्साहित उद्यमी:नए स्टार्टअप और छोटे उद्योग लगाने वाले युवाओं में निराशा का माहौल।

स्थानीय उद्यमियों का कहना है कि सरकार की नीतियां कागजों पर तो बहुत सुंदर दिखती हैं, लेकिन जब वही नीतियां सरकारी दफ्तरों की चौखट पार करती हैं, तो भ्रष्ट तंत्र और लेटलतीफी की बलि चढ़ जाती हैं। सवाल यह उठता है कि अगर ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) का नारा प्रदेश में बुलंद है, तो फिर व्यापारी वर्ग इतना त्रस्त क्यों है?

मुख्यमंत्री मोहन यादव को इस गंभीर समस्या पर सीधी दखल देनी होगी। क्या सीएम उन अधिकारियों पर नकेल कसेंगे जो विकास की गति को धीमा कर रहे हैं? या फिर मध्य प्रदेश का व्यापारी इसी तरह व्यवस्था की बेड़ियों में जकड़ा रहेगा? यह एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब प्रदेश का हर छोटा-बड़ा कारोबारी मांग रहा है।

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gaurav singh rajput

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