कॉकरोच जनता पार्टी’ और तंत्र की संवेदनहीनता: क्या युवाओं के भविष्य को कुचलना ही सरकार और न्यायपालिका का नया धर्म है?

आज लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ से एक ऐसी हकीकत बयां की जा रही है, जो सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों और न्याय के मंदिर में ऊंचे आसनों पर विराजमान नीति-निर्धारकों को आईना दिखाएगी। भारत, जिसे ‘युवाओं का देश’ कहा जाता है, आज उसी युवा शक्ति की आंखों में धूल झोंकने का काम धड़ल्ले से किया जा रहा है।

एक तरफ वह ‘राजनीतिक दल’ है जिसे जनता की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं रह गया है, जिसे प्रबुद्ध वर्ग अब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की संज्ञा दे रहा है—जो केवल सत्ता की गंदगी में पनपना जानती है। दूसरी तरफ, भारत सरकार की नीतियां हैं, जो युवाओं के रोजगार और भविष्य को लेकर इतनी ‘घटिया’ और खोखली साबित हुई हैं कि आज का पढ़ा-लिखा युवा सड़क पर बैठने को मजबूर है।

1. सरकार की विफल नीतियां: सरकार की युवा विरोधी सोच ने देश के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। केवल नारों से पेट नहीं भरता। जमीनी हकीकत यह है कि युवा डिग्री लेकर दर-दर भटक रहा है, लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
2. न्यायपालिका पर तीखा कटाक्ष: दुख तो तब होता है जब न्याय की अंतिम उम्मीद, यानी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और पूरी न्यायिक व्यवस्था भी युवाओं की इस तड़प को समझने में नाकाम नजर आती है। क्या न्यायपालिका केवल रसूखदारों के लिए है? युवाओं के हितों से जुड़े मामलों पर शीर्ष अदालत की सुस्ती और उनकी ‘घटिया’ संवेदनहीनता यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वाकई यह तंत्र आम आदमी के साथ खड़ा है?
3. ब्रांडवाणी का सवाल: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की सत्ता लोलुपता और प्रशासनिक तंत्र की युवाओं के प्रति यह नफरत और उपेक्षा कब तक चलेगी? क्या युवा केवल वोट बैंक का एक आंकड़ा मात्र बनकर रह गया है?

भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट को यह समझना होगा कि यदि देश का युवा अपनी शक्ति का सही उपयोग करने पर उतर आया, तो यह ‘घटिया’ सोच और भ्रष्ट व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। ब्रांडवाणी समाचार युवाओं के हक की लड़ाई तब तक लड़ता रहेगा, जब तक सत्ता के गलियारों में बैठे ये ‘कॉकरोच’ और संवेदनहीन अधिकारी जाग नहीं जाते।

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gaurav singh rajput

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