
प्रदेश के एक प्रमुख विभाग में हाल ही में एक बड़े टेंडर को निरस्त किए जाने का मामला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जानकारी के अनुसार यह टेंडर मेनपावर सप्लाई से जुड़ा हुआ था और इसकी अनुमानित लागत एक हजार करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही थी। सूत्रों का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान कुछ गंभीर शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद विभागीय स्तर पर पूरे मामले की समीक्षा शुरू की गई। समीक्षा के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर टेंडर को निरस्त करने का निर्णय लिया गया, जिससे संबंधित क्षेत्र में नई चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
बताया जा रहा है कि शिकायतों में टेंडर की कुछ शर्तों और पात्रता मानकों को लेकर सवाल उठाए गए थे। आरोप यह था कि प्रक्रिया को इस प्रकार तैयार किया गया था जिससे सीमित संख्या में कंपनियां ही प्रतिस्पर्धा में भाग ले सकें। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने मामले को हल्के में लेने के बजाय विस्तृत परीक्षण को प्राथमिकता दी। इसी क्रम में उच्च स्तर पर विचार-विमर्श के बाद टेंडर को रद्द करने का फैसला लिया गया।
सूत्रों के मुताबिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि भविष्य में किसी भी प्रकार की विवादास्पद स्थिति उत्पन्न न हो और प्रक्रिया अधिक पारदर्शी तरीके से संचालित की जा सके। यही वजह है कि जल्दबाजी में आगे बढ़ने के बजाय पूरे मामले की पुनः समीक्षा की गई। विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि इस निर्णय के पीछे पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने का उद्देश्य प्रमुख रूप से शामिल रहा है।
फिलहाल टेंडर निरस्त होने के बाद विभाग की अगली रणनीति को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। माना जा रहा है कि विभाग निकट भविष्य में नई शर्तों और संशोधित प्रक्रिया के साथ पुनः टेंडर जारी कर सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसके बावजूद करोड़ों रुपये के इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर लिए गए फैसले ने प्रशासनिक, कारोबारी और राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है।
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