
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक हाई-प्रोफाइल लाउंज को लेकर चौंकाने वाले आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि यहां देर रात तक चलने वाली पार्टियों के दौरान बिना वैध लाइसेंस शराब परोसी जा रही थी, जबकि ग्राहकों को दिए जाने वाले बिल में शराब या बीयर का नाम लिखने के बजाय विशेष कोड वर्ड का इस्तेमाल किया जा रहा था। इतना ही नहीं, डिजिटल भुगतान के लिए इस्तेमाल किए जा रहे UPI QR कोड का नाम कथित तौर पर किसी किराना दुकान के नाम से जुड़ा हुआ था, जिससे वास्तविक लेन-देन की प्रकृति छिपाई जा सके। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह केवल आबकारी नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं होगा, बल्कि वित्तीय रिकॉर्ड और कर संबंधी जांच का विषय भी बन सकता है। फिलहाल संबंधित एजेंसियों ने उपलब्ध जानकारी और दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, लाउंज में आने वाले ग्राहकों को सामान्य रेस्टोरेंट बिल की तरह रसीद दी जाती थी, लेकिन उसमें बीयर, व्हिस्की या अन्य शराब के नाम की जगह अलग-अलग कोड दर्ज किए जाते थे। आरोप है कि इस तरीके का इस्तेमाल वास्तविक बिक्री को छिपाने और रिकॉर्ड में अलग प्रकार के लेन-देन दिखाने के लिए किया जाता था। वहीं, ऑनलाइन भुगतान करने वाले ग्राहकों से राशि ऐसे UPI अकाउंट में ट्रांसफर कराई जाती थी, जिसका नाम किसी किराना दुकान या अन्य व्यवसाय के रूप में दिखाई देता था। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह व्यवस्था कितने समय से चल रही थी, इससे कितना कारोबार हुआ और क्या इसमें केवल लाउंज प्रबंधन शामिल था या अन्य लोग भी इस नेटवर्क का हिस्सा थे। यदि डिजिटल भुगतान के माध्यम से लेन-देन को जानबूझकर छिपाया गया है, तो आयकर और वित्तीय जांच एजेंसियां भी मामले की जांच कर सकती हैं।
मामले के सामने आने के बाद आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। नियमों के अनुसार शराब परोसने वाले किसी भी प्रतिष्ठान के पास वैध लाइसेंस होना अनिवार्य है और शराब की बिक्री तथा स्टॉक का पूरा रिकॉर्ड विभाग के निर्धारित नियमों के अनुसार रखा जाना चाहिए। यदि बिना लाइसेंस शराब परोसने या बिक्री के रिकॉर्ड में हेरफेर की पुष्टि होती है, तो संबंधित प्रतिष्ठान के खिलाफ लाइसेंस निरस्तीकरण, आर्थिक दंड और आपराधिक कार्रवाई तक की जा सकती है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान बिलिंग रिकॉर्ड, CCTV फुटेज, स्टॉक रजिस्टर, बैंक खातों और UPI लेन-देन की भी जांच की जाएगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि कहीं इस प्रकार की व्यवस्था शहर के अन्य प्रतिष्ठानों में भी तो नहीं अपनाई जा रही।
फिलहाल इस मामले में अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है और जांच एजेंसियों ने किसी भी प्रकार की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। भारतीय कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति या प्रतिष्ठान को तब तक दोषी नहीं माना जाता, जब तक जांच पूरी न हो जाए और पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर कानूनी प्रक्रिया में आरोप सिद्ध न हो जाएं। हालांकि, इस घटनाक्रम ने राजधानी भोपाल की नाइटलाइफ, आबकारी नियमों के पालन और डिजिटल भुगतान प्रणाली के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल एक लाउंज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अवैध शराब कारोबार, टैक्स अनुपालन और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़ी व्यापक जांच का कारण भी बन सकता है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और प्रशासन की कार्रवाई पर सभी की नजर रहेगी।
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