
देश की राजधानी दिल्ली आज एक ऐसे भयावह दौर से गुजर रही है, जहां पानी की हर एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है। राजनीति के चमचमाते मंचों से मुफ्त पानी का ढिंढोरा पीटने वाले हुक्मरान आज जनता की प्यास बुझाने में पूरी तरह विफल साबित हुए हैं।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) और संबंधित विभाग आज मूकदर्शक बने बैठे हैं। यमुना नदी को नाले में तब्दील कर दिया गया और जब जनता के घरों तक जहरीला, गंदा और बदबूदार पानी पहुंच रहा है, तो प्रशासनिक अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। क्या जनता टैक्स सिर्फ इसलिए देती है कि संकट के समय उन्हें बूंद-बूंद पानी के लिए टैंकरों के पीछे भागना पड़े?
यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता और नीतिगत अपंगता का जीता-जागता प्रमाण है। एक तरफ वीआईपी इलाकों में पानी की चौबीस घंटे निर्बाध आपूर्ति होती है, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिक, झुग्गी-झोपड़ी और मध्यमवर्गीय बस्तियां पानी की एक-एक बाल्टी के लिए आपस में लड़ने को मजबूर हैं।
‘ब्रांडवाणी समाचार’ सीधे तौर पर जिम्मेदार अधिकारियों और सरकार से यह सवाल पूछता है कि आखिर कब तक दिल्ली की जनता को इस बुनियादी जरूरत के लिए तरसाया जाएगा? कागजी योजनाओं और फाइलों में सिमटी बैठकों से बाहर निकलिए, क्योंकि दिल्ली की प्यासी जनता अब आपके झूठे आश्वासनों से बहलने वाली नहीं है।
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