
भोपाल/मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई योजनाएं लागू की गईं, जिनका ढिंढोरा तो बहुत पीटा गया, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट रही। ब्रांडवाणी समाचार के इस विशेष विश्लेषण में हम उन विभागों और उनके आला अधिकारियों (ब्यूरोक्रेट्स) की कार्यप्रणाली का पर्दाफाश कर रहे हैं, जिनकी बनाई नीतियों के कारण आज मध्य प्रदेश का युवा बेरोज़गारी की मार झेल रहा है और राज्य सरकार ऐतिहासिक क़र्ज़ के बोझ तले दब चुकी है।
- तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास और रोज़गार विभाग: सिर्फ़ कागज़ों पर ‘कौशल’
ज़िम्मेदार अधिकारी: संजय गुप्ता (संचालक)
योजनाएं: मुख्यमंत्री युवा इंटर्नशिप योजना (CMYIP) और विभिन्न कौशल विकास मेले।
विफलता का विश्लेषण: इन अधिकारियों के नेतृत्व में विभाग ने युवाओं को इंटर्नशिप और अल्पकालिक प्रशिक्षण देने की योजनाएं तो बनाईं, लेकिन इन्हें स्थायी रोज़गार में बदलने का कोई ठोस रोडमैप नहीं था। करोड़ों रुपये का बजट ट्रेनिंग और वजीफे में फूंक दिया गया, लेकिन उद्योगों के साथ सही समन्वय न होने के कारण ये युवा ट्रेनिंग के बाद फिर बेरोज़गार हो गए। इससे प्रदेश में शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई।
- वित्त विभाग: बेलगाम वित्तीय नीतियां और क़र्ज़ का पहाड़
विभाग प्रमुख / ज़िम्मेदार अधिकारी: अजीत केसरी (अपर मुख्य सचिव, वित्त)
योजनाएं / नीतियां: निरंतर बाज़ार से लोन (ऋण) लेने की नीतियां और अनुत्पादक खर्चों को मंज़ूरी।
विफलता का विश्लेषण: वित्त विभाग के शीर्ष अधिकारियों की विफलता यह रही कि वे राज्य की आय बढ़ाने के नए स्रोत नहीं खोज पाए। लोक-लुभावन और तात्कालिक लाभ वाली योजनाओं के लिए लगातार हज़ारों करोड़ का क़र्ज़ लिया गया। आज स्थिति यह है कि बजट का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ़ पुराने क़र्ज़ का ब्याज़ चुकाने में जा रहा है, जिससे नए उद्योग लगाने या नई सरकारी भर्तियां निकालने के लिए सरकार के पास फंड ही नहीं बच रहा है।
- औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन विभाग: निवेश के बड़े दावे, ज़मीन पर सन्नाटा
विभाग प्रमुख / ज़िम्मेदार अधिकारी: राघवेन्द्र कुमार सिंह (प्रमुख सचिव)
योजनाएं / नीतियां: ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS) और उद्योग संवर्धन नीतियां।
विफलता का विश्लेषण: इन्वेस्टर्स समिट के नाम पर अधिकारियों ने विदेशों और बड़े महानगरों में रोड शो किए, करोड़ों रुपये इवेंट मैनेजमेंट में खर्च हुए। कागज़ों पर लाखों करोड़ के एमओयू साइन हुए, लेकिन ज़मीनी स्तर पर रेड-टेपिज़्म (लालफीताशाही) और प्रशासनिक ढिलाई के कारण ये निवेश ज़मीन पर नहीं उतर पाए। नए उद्योग न आने से स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर पैदा नहीं हुए, जिससे बेरोज़गारी चरम पर पहुंच गई।
मध्य प्रदेश को क्या हुआ बड़ा नुक़सान?
अधिकारियों की इन अदूरदर्शी नीतियों के कारण प्रदेश को तीन मोर्चों पर भारी नुक़सान उठाना पड़ा है:
मानव संसाधन की बर्बादी: मध्य प्रदेश का युवा उच्च शिक्षा और तकनीकी डिग्री लेने के बाद भी चपरासी और संविदा पदों के लिए कतारों में खड़ा है। युवाओं का मनोबल टूटा है और वे पलायन करने को मजबूर हैं।
आर्थिक दिवालियापन की स्थिति: प्रदेश पर क़र्ज़ का बोझ ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है। हर नागरिक पर हज़ारों रुपये का क़र्ज़ है। विकास कार्यों के बजाए क़र्ज़ के चक्रव्यूह को संभालने में राजस्व खर्च हो रहा है।
औद्योगिक साख को धक्का: कागज़ी आंकड़ों और वास्तविक धरातल में अंतर होने के कारण बड़ी कंपनियां मध्य प्रदेश में निवेश करने से कतरा रही हैं, जिससे पड़ोसी राज्यों की तुलना में एमपी पिछड़ रहा है।
सरकारें बदलती हैं, लेकिन नीतियां बनाने वाले ये रसूखदार अधिकारी वहीं रहते हैं। जब तक इन विभागों के प्रमुखों की जवाबदेही तय नहीं होगी और केवल ‘एसी कमरों’ में बैठकर योजनाएं बनती रहेंगी, तब तक मध्य प्रदेश को बेरोज़गारी और क़र्ज़ के इस दुष्चक्र से बाहर निकालना नामुमकिन होगा। मुख्यमंत्री को इन बेलगाम ब्यूरोक्रेट्स की फाइलों की समीक्षा खुद ज़मीनी स्तर पर करनी होगी।
- विशेष रिपोर्ट, ब्रांडवाणी समाचार ब्यूरो।








