शोषक तंत्र पर तीखा प्रहार, आउटसोर्सिंग के नाम पर ‘आधुनिक बंधुआ मजदूरी’ का घिनौना खेल, कब तक मूकदर्शक बनी रहेगी सरकार?

नेताओं-अफसरों के वेतन में चार गुना उछाल और मुफ्त चिकित्सा की बहार लेकिन देश का रीढ़ कहलाने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों को सिर्फ कौड़ियों का दाम और अंतहीन दुत्कार! मापदंडों को ताक पर रखकर देश की अर्थव्यवस्था से हो रहा खिलवाड़।

विशेष ब्यूरो, ब्रांडवाणी समाचार

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा’ का नारा सिर्फ किताबों तक सीमित हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था किसी गंभीर और लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हो चुकी है। आज देश के भीतर आउटसोर्सिंग (ठेका प्रथा) के नाम पर जो कुछ भी चल रहा है, वह किसी आधुनिक गुलामी या संगठित संस्थागत शोषण से कम नहीं है। न्याय के सर्वोच्च मंदिरों यानी माननीय उच्च न्यायालयों तक में अब यह गूंज सुनाई देने लगी है कि पूरे राष्ट्र के आउटसोर्स कर्मचारियों की दशा अत्यंत दयनीय हो चुकी है। कोर्ट भी इस अमानवीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठा रहा है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-नियंताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

हैरानी और घोर शर्म की बात यह है कि जो आउटसोर्स कर्मचारी दिन-रात एक करके सरकारी विभागों, अस्पतालों, बिजली दफ्तरों और नगर निगमों की व्यवस्था को अपने कंधों पर संभाले हुए हैं, उन्हें काम के बदले नाममात्र का मानदेय दिया जाता है। नियम कहते हैं कि ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ मिलना चाहिए, परंतु हकीकत यह है कि इन बेबस कर्मचारियों से तय सीमा से 100 गुना ज्यादा काम लिया जाता है और जब उनके हक की सैलरी की बात आती है, तो सरकारी खजाना खाली होने का रोना रोया जाता है। भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने इन गरीब कामगारों का जीना मुहाल कर रखा है।

जब खुद की सैलरी बढ़ानी हो, तो विधायक, मंत्री और बड़े अफसर रातों-रात बिना किसी बहस के कानून पास कर अपनी आय चार गुनी कर लेते हैं। उन्हें मुफ़्त इलाज चाहिए, शानदार बंगले चाहिए, और देश के टैक्सपेयर्स के पैसों पर अय्याशी चाहिए। लेकिन जब देश का असली मजदूर अपने हक के लिए आवाज उठाता है, तो बजट का रोना रोकर उसे दुत्कार दिया जाता है।

आज सरकारों का एक ही मूलमंत्र रह गया है ‘फ्री’ का लालच देकर वोट बटोरना। चुनाव जीतने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटी जा रही हैं, लेकिन जो युवा, जो कर्मचारी अपनी पूरी जवानी देश की सेवा में खपा रहा है, उसे एक सुरक्षित भविष्य तक नसीब नहीं है। यह कैसी देश सेवा है? यह कैसा राष्ट्र निर्माण है? हकीकत तो यह है कि सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ भ्रष्ट दलाल, बड़े ठेकेदार और कुर्सी से चिपके अधिकारी मिलकर देश की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं। जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई इन भ्रष्ट मगरमच्छों की जेबों में जा रही है और देश का आम नागरिक आर्थिक रूप से बिकने पर मजबूर हो रहा है।

काम करने वाला गरीब आज भी दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहा है, जबकि एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर फाइलों पर दस्तखत करने वाले साहबों के भत्ते और मेडिकल फैसिलिटी हर महीने बढ़ रही हैं। यह सीधे तौर पर 420 (धोखाधड़ी) का खेल है जो कानून की आड़ में सरेआम खेला जा रहा है।

ब्रांडवाणी समाचार बेबाक शब्दों में यह सवाल उठाता है कि क्या इन सफेदपोशों और दलालों को वास्तव में भारत मां से कोई सरोकार है? क्या इन्हें वतन की मिट्टी और भारत देश के तिरंगे झंडे की आन-बान-शान से कोई मतलब है? जवाब है कतई नहीं! इनके लिए राष्ट्रवाद सिर्फ एक चुनावी मुखौटा है। जो लोग देश के सबसे कमजोर और गरीब वर्ग का खून चूसकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, वे सबसे बड़े देशद्रोही हैं। ये ऐसे ठेकेदार हैं जो देश के ईमानदार श्रम को कौड़ियों के भाव बेचकर खुद अरबपति बन बैठे हैं। इनके लिए वतन नहीं, बल्कि सिर्फ ‘दलाली और कमीशन’ ही इनका असली मजहब बन चुका है।

अब समय आ गया है कि इस शोषक व्यवस्था के खिलाफ देश का हर एक शोषित वर्ग एकजुट हो। यदि आज आवाज नहीं उठाई गई, तो वह दिन दूर नहीं जब देश का गरीब पूरी तरह तबाह हो जाएगा और पूरा तंत्र इन चंद भ्रष्ट बाबुओं और ठेकेदारों का गुलाम बन जाएगा। माननीय न्यायालय के रुख ने एक उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन जब तक इन भ्रष्ट अधिकारियों और शोषक मंत्रियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह बदलाव संभव नहीं है। ब्रांडवाणी समाचार आउटसोर्स कर्मचारियों की इस लड़ाई में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और इस तानाशाही के खिलाफ अपनी कलम की धार को कभी कम नहीं होने देगा।

 तीखी प्रतिक्रिया और निष्पक्ष विश्लेषण के साथ, ब्रांडवाणी समाचार संपादकीय मंडल।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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