
मध्य प्रदेश के वन विभाग में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक नया आदेश चर्चा का विषय बन गया है। वन विभाग के प्रमुख सचिव अशोक बर्नवाल द्वारा जारी आदेश में प्रदेश के जिला स्तर पर पदस्थ वन मंडल अधिकारियों (DFO) को हर सप्ताह आयोजित होने वाली जिला स्तरीय समय-सीमा (TL) बैठक में शामिल होने के निर्देश दिए गए हैं। आदेश के अनुसार जिले में सामान्य तौर पर आयोजित होने वाली बैठकों में वन मंडलाधिकारी की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी और वे बिना अनुमति या पूर्व सूचना के मुख्यालय नहीं छोड़ सकेंगे। बताया जा रहा है कि इस आदेश की प्रतियां प्रदेश के सभी कलेक्टरों के साथ-साथ वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को भी भेजी गई हैं।
आदेश के तहत भूमि विवाद और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय से जुड़े मामलों को विशेष प्राथमिकता देने की बात कही गई है। वन विभाग से संबंधित भूमि विवादों या अन्य विभागों के साथ लंबित मामलों को जिला प्रशासन के सहयोग से तेजी से निपटाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए DFO को कलेक्टर के साथ बैठक कर विवादों और लंबित मुद्दों के समाधान की प्रक्रिया तेज करने को कहा गया है। इसके अलावा जिन विषयों में अन्य विभागों या जिला प्रशासन के साथ समन्वय की आवश्यकता है, उनमें भी समय पर कार्रवाई और बैठक में उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
वन विभाग के इस आदेश के बाद प्रशासनिक हलकों में इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या जिला स्तर पर वन विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही अब पहले से अधिक कलेक्टर और जिला प्रशासन के साथ जुड़ने जा रही है। हालांकि विभागीय स्तर पर इसका उद्देश्य प्रशासनिक समन्वय बढ़ाना और भूमि विवादों सहित विभिन्न लंबित मामलों का तेजी से समाधान करना माना जा रहा है। लेकिन DFO को नियमित रूप से TL बैठकों में शामिल होने और मुख्यालय छोड़ने से पहले सूचना सुनिश्चित करने के निर्देश ने यह बहस भी छेड़ दी है कि वन विभाग की स्वतंत्र प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जिला प्रशासन के बीच नया समन्वय किस तरह काम करेगा।
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