कागजी एमओयू के मायाजाल से बाहर निकला मध्य प्रदेश, डॉ. मोहन यादव का विकेंद्रीकृत औद्योगिक मॉडल बनाम शिवराज का इवेंट मैनेजमेंट का तगड़ा दिखावा

इंदौर-भोपाल के दायरे से निकलकर विंध्य, महाकौशल, चंबल और बुंदेलखंड तक पहुंची पूंजी, यदि मुख्यमंत्री की प्रशासनिक और कोर टीम ने अपनी दृष्टि का दायरा बढ़ाया, तो प्रदेश को विकसित राज्यों की अग्रिम पंक्ति में आने से कोई नहीं रोक सकता।

निवेश की नई परिभाषा, दावों के शोर से दूर, सीधे जमीन पर परिणाम

मध्य प्रदेश के औद्योगिक इतिहास में पिछले दो दशक ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ (GIS) के चकाचौंध भरे आयोजनों के गवाह रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान के 15 वर्षों से अधिक के कार्यकाल में प्रदेश को देश और दुनिया के नक्शे पर एक ‘इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन’ के रूप में प्रचारित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। मंच सजे, उद्योगपतियों का जमावड़ा लगा और लाखों करोड़ रुपये के प्रस्तावों के आंकड़े हवा में तैराए गए।

किंतु, जब उन आंकड़ों का ऑडिट किया गया, तो सच्चाई किसी से छिपी नहीं रही। शिवराज सरकार के दौर में कुल प्रस्तावित निवेश का महज 10 से 13 प्रतिशत ही वास्तविक धरातल पर उतर सका। अरबों रुपये के ‘नॉन-बाइंडिंग एमओयू’ (गैर-बाध्यकारी सहमति पत्र) फाइलों की शोभा बनकर रह गए।

दिसंबर 2023 में जब डॉ. मोहन यादव ने राज्य की कमान संभाली, तो उन्होंने सबसे पहले इस पारंपरिक और खोखले इवेंट कल्चर पर प्रहार किया। डॉ. यादव ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास केवल राजधानी भोपाल और व्यावसायिक नगरी इंदौर के कॉरीडोर तक सीमित नहीं रह सकता। उन्होंने कागजी एमओयू की रस्म अदायगी को बंद कर ‘रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव’ और मंच से ही ‘डिजिटल लैंड अलॉटमेंट’ (भूमि आवंटन पत्र) का एक ऐसा ठोस और व्यावहारिक मॉडल पेश किया, जिसने निवेश की वास्तविक परिभाषा ही बदल दी है।

शिवराज का दौर, आंकड़ों की बाजीगरी और फाइलों में कैद परियोजनाएं

शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में आयोजित सम्मेलनों का इतिहास यह बताता है कि सरकार का पूरा ध्यान सुर्खियां बटोरने पर अधिक और क्रियान्वयन पर कम रहा:

  • 2007 और 2010 की समिट्स: क्रमशः ₹1.02 लाख करोड़ और ₹2.35 लाख करोड़ के प्रस्ताव आए, जिनमें से अधिकांश 90 प्रतिशत प्रारंभिक स्तर पर ही दम तोड़ गए।
  • 2012 और 2014 की समिट्स: 2014 के आयोजन में ₹6.79 लाख करोड़ के 2,630 से अधिक इरादे पत्र आए। लेकिन जमीन पर सब जीरो रहा।
  • 2016 की समिट: ₹5.63 लाख करोड़ के दावों के साथ संपन्न हुई, लेकिन धरातल पर 12% से अधिक पूंजी नहीं आई।
  • 2023 की अंतिम GIS (इंदौर): सरकार ने ₹15.42 लाख करोड़ के निवेश इरादे दर्ज किए और 29 लाख रोजगार के दावे किए।

सच्चाई यह रही कि करीब ₹12 से ₹15 लाख करोड़ के प्रस्तावों में से जमीन पर बमुश्किल ₹1.2 से ₹1.5 लाख करोड़ ही उतरे। निवेश का दायरा पीथमपुर, मंडीदीप और देवास के आगे बढ़ ही नहीं पाया। शेष मध्य प्रदेश खासकर विंध्य, महाकौशल, चंबल, ग्वालियर और बुंदेलखंड औद्योगिक विकास की बाट जोहता रहा।

डॉ. मोहन यादव की साहसिक पहल: विकेंद्रीकरण और ऑन-द-स्पॉट आवंटन

डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही समझ लिया कि यदि प्रदेश की तस्वीर बदलनी है, तो विकास को संभाग स्तर तक ले जाना होगा। उन्होंने इंदौर के सेंट्रलाइज्ड मॉडल को तोड़कर क्षेत्रीय स्तर पर उद्यमियों को मंच दिया

  1. उज्जैन कॉन्क्लेव (मार्च 2024): धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी में करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव धरातल पर उतरे और सीधे जमीन आवंटन पत्र बांटे गए।
  2. जबलपुर कॉन्क्लेव (जुलाई 2024): महाकौशल की उपेक्षा खत्म करते हुए डिफेंस, गारमेंट्स और मिनरल्स आधारित उद्योगों के लिए ₹17,000 करोड़ के ठोस प्रस्ताव जमीन पर लाए गए।
  3. ग्वालियर कॉन्क्लेव (अगस्त 2024): चंबल-ग्वालियर अंचल में औद्योगिक माहौल बनाने के लिए ₹8,000 करोड़ का रोडमैप तैयार हुआ।
  4. सागर कॉन्क्लेव (सितंबर 2024): बुंदेलखंड जैसे सूखे और पिछड़े अंचल के लिए ₹23,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाएं (पेट्रोकेमिकल्स और बीना रिफाइनरी विस्तार) तय की गईं।
  5. रीवा और विंध्य क्षेत्र: ऊर्जा, सीमेंट और प्रचुर खनिज संपदा से संपन्न विंध्य को पहली बार उसकी क्षमता के अनुरूप औद्योगिक पहचान मिली।

डॉ. मोहन यादव का सबसे बड़ा नीतिगत सुधार यह रहा कि वे उद्योगपतियों को केवल एमओयू साइन करवाकर विदा नहीं करते, बल्कि सिंगल विंडो क्लीयरेंस और मंच से ही पजेशन लेटर जारी करवाते हैं। यह बदलाव नौकरशाही की लालफीताशाही पर सीधा प्रहार है।

दोनों कार्यकालों का नीतिगत अंतर

पैमानाशिवराज सिंह चौहानडॉ. मोहन यादव
मॉडल का स्वरूपइंदौर-केंद्रित बड़ा अंतरराष्ट्रीय मेला (GIS)अंचल-आधारित ‘रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव’
प्रस्ताव बनाम क्रियान्वयन₹15 लाख करोड़ तक के गैर-बाध्यकारी एमओयू; धरातल पर मात्र 10–18%सीधे लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) और मंच से डिजिटल भूमि आवंटन
क्षेत्रीय संतुलनभोपाल, इंदौर, पीथमपुर तक सीमितविंध्य, महाकौशल, चंबल, बुंदेलखंड और मालवा का संतुलित विकास
प्राथमिकता वाले क्षेत्रपरंपरागत टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल और सेवाएंखनिज संपदा, रक्षा उत्पादन, पेट्रोकेमिकल, ऊर्जा और एमएसएमई
कार्यशैलीघोषणा-आधारित और प्रचार-उन्मुखफील्ड-आधारित, त्वरित निर्णय और धरातलीय परिणाम

सबसे बड़ा सवाल, क्या मुख्यमंत्री के विजन के साथ कदमताल कर पा रही है उनकी टीम?

मध्य प्रदेश को आज एक ऐसा नेतृत्व मिला है जिसके पास विजन की स्पष्टता है, माटी से जुड़ाव है और निर्णय लेने का राजनीतिक साहस है। डॉ. मोहन यादव की सोच केवल कुर्सी चलाने की नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश को ‘बीमारू’ तमगे से पूरी तरह मुक्त कर देश के शीर्ष औद्योगिक राज्यों की पंक्ति में खड़ा करने की है। लेकिन अफ़सरशाही जो उनको नजदीक है उनको सामाजिक छवि को सही से नहीं दिखा पा रही है बेहद इन अफ़सरों का सितारा कामजोर है।

किंतु, यहाँ एक कड़वा और आत्ममंथन करने योग्य यथार्थ भी है

किसी भी मुख्यमंत्री का विजन तभी फलीभूत होता है जब उसके इर्द-गिर्द मौजूद तंत्र चाहे वह उनका व्यक्तिगत स्टाफ हो, सलाहकार मंडल हो या प्रशासनिक अधिकारी (ब्यूरोक्रेसी) उसी गति और दृष्टि से कार्य करे। वर्तमान में धरातल पर यह खाई स्पष्ट दिखाई देती है अफसरशाही इतनी हावी है कि मुख्यमंत्री तक अच्छे प्रोजेक्ट नहीं पहुंच रहे है जिसमें ज़्यादा रोज़गार मिल सके।

  1. अधिकारियों की पुरानी जड़ता: मध्य प्रदेश की नौकरशाही अभी भी उसी पुराने ‘शिवराज कालीन ढर्रे’ में जीने की आदी दिखती है, जहाँ फाइलों को घुमाना, बैठकों का दौर चलाना और कागजी लक्ष्य पूरा करना ही सफलता माना जाता था। डॉ. यादव जिस आक्रामकता और गति से फैसले लेते हैं, सचिवालय और जिला स्तर के अधिकारी उस गति को नहीं पकड़ पा रहे।
  2. सोच के दायरे का संकुचित होना: मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत और प्रशासनिक अमले को अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। यदि टीम के लोग संकीर्ण मानसिकता, व्यक्तिगत पसंद-नापसंद या छोटे-मोटे राजनीतिक दांव-पेचों में उलझे रहेंगे, तो मुख्यमंत्री के बड़े फैसलों की चमक भी धूमिल होगी अफसरशाही द्वारा मध्य प्रदेश के व्यावसायियों जो मध्य प्रदेश को समझते हैं उनके प्रोजेक्ट को कचरे में फेंक दिया है उनको जनता के नहीं अपने विकास की चिंता ज्यादा होती है और बदनामी का ठीकरा अंततः मुख्यमंत्री के सिर फूटेगा।
  3. कम्युनिकेशन और फीडबैक का अभाव: ज़मीनी उद्योगपतियों, स्थानीय उद्यमियों और नीति-निर्माताओं की सीधी पहुंच मुख्यमंत्री तक पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। अक्सर अधिकारियों की एक चौकड़ी मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द ऐसा घेरा बना लेती है जिससे सही फीडबैक उन तक नहीं पहुंच पाता।

विकसित मध्य प्रदेश की राह, टीम को बदलना होगा अपना नजरिया

डॉ. मोहन यादव ने अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति से यह साबित कर दिया है कि वे केवल भाषणों के नेता नहीं हैं। वे रीवा के पहाड़ों से लेकर बुंदेलखंड के बीहड़ों तक उद्योग लगाने की व्यावहारिक योजना पर काम कर रहे हैं।

यदि उनकी कोर टीम अधिकारी और निजी सहयोगी अपनी कार्यशैली में व्यापक सुधार कर ले, अपनी दृष्टि को विशाल बनाए और मुख्यमंत्री के विजन को धरातल पर उतारने में एक सुरक्षा कवच और उत्प्रेरक का काम करे, तो मध्य प्रदेश का कायाकल्प तय है।

अब समय आ गया है कि नौकरशाही फाइलों से बाहर निकले, पुराने तौर-तरीकों को त्यागे और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ मिलकर उस संकल्प को पूरा करे, जो मध्य प्रदेश को वास्तव में देश का औद्योगिक ग्रोथ इंजन बना सकता है।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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