‘सड़क नहीं तो वोट नहीं’, गुना में ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने जब फूटा एक मतदाता का दर्द, सत्ता के गलियारों में गूंजा लोकतंत्र का सबसे कड़वा सच?

गुना / भोपाल

लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत और सबसे ताकतवर तस्वीर वह नहीं होती जब कोई कद्दावर नेता मंच पर खड़े होकर माइक से वादों की झड़ी लगाता है; लोकतंत्र की असली और जीवंत तस्वीर तब सामने आती है जब एक आम, साधनहीन मतदाता अपनी फटी बिवाइयों और धूल धूसरित कपड़ों के साथ सत्ता के सबसे बड़े रसूखदार के सामने सीना तानकर खड़ा हो जाए और अपनी बदहाली का हिसाब मांग ले।

मध्य प्रदेश के गुना लोकसभा क्षेत्र से एक ऐसी ही घटना सामने आई है, जिसने न केवल सत्ता के शीर्ष गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक विमर्श को इस बुनियादी सवाल पर लाकर खड़ा कर दिया है—क्या लोकतंत्र में जनता केवल पांच साल में एक बार उंगली पर स्याही लगवाने की मशीन है, या फिर उसके दुख, उसकी बुनियादी पीड़ा और उसके सवालों की कोई कीमत सत्ता के मठाधीशों की नजर में बची है?

केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्षेत्रीय दौरे के दौरान जब एक ग्रामीण मतदाता ने वर्षों से उपेक्षित, कीचड़ से सनी और गड्ढों में तब्दील हो चुकी सड़क को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की, तो उसके मुंह से अनायास ही वह सच निकल पड़ा जिसे सुनकर बड़े-बड़े सूरमाओं के पसीने छूट जाते हैं। मतदाता ने दो टूक शब्दों में भारी मन और दर्द से रुंधे गले से कह दिया—“यदि सड़क निर्माण नहीं होगा, तो अगली बार वोट मांगने मत आइएगा।”

यह केवल एक गांव की एक सड़क का रोना नहीं था, यह उस आम भारतीय मतदाता की चीख थी जो आजादी के सात दशकों बाद भी चलने लायक डामर की सड़क, पीने का साफ पानी और अस्पताल पहुंचने की बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है।

क्या मतदाता अब अपनी बात भी नहीं कह सकता?

इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में जनता से उसकी जुबान भी छीन ली जाएगी? जब चुनाव आते हैं, तो यही रसूखदार राजनेता हाथ जोड़कर, नतमस्तक होकर चौपालों, पगडंडियों और खलिहानों की खाक छानते हैं। जनता के पैरों में झुकते हैं, चाय की टपरी पर बैठकर समरसता का ढोंग करते हैं और वादों के ऐसे महल खड़े करते हैं जिनका धरातल से कोई वास्ता नहीं होता।

लेकिन जैसे ही ईवीएम की सील बंद होती है और विजय जुलूस की धूल बैठती है, वैसे ही सत्ताधीशों की गाड़ियां बुलेटप्रूफ शीशों के पीछे कैद हो जाती हैं। उनके चारों ओर सुरक्षाकर्मियों का ऐसा अभेद्य घेरा खिंच जाता है कि जिस मतदाता ने उन्हें संसद की चौखट तक पहुंचाया, वही अपनी बदहाली की गुहार लगाने के लिए कलेक्ट्रेट और नेताओं के बंगलों के चक्कर काटते-काटते अपनी चप्पलें घिस देता है।

क्या सत्ता के रसूख में चूर नेता मतदाता के इस गहरे मलाल को कभी समझ पाएंगे? गुना का वह ग्रामीण जब मंत्री महोदय के सामने यह कह रहा था, तब उसकी आंखों में गुस्सा कम, बेबसी और हताशा ज्यादा थी। वह सड़क केवल चलने का साधन नहीं थी; उस सड़क से गांव की गर्भवती महिलाओं की जान जुड़ी थी, उस सड़क से स्कूल जाने वाले बच्चों का भविष्य जुड़ा था, उस सड़क से खेत में पैदा हुई उपज को मंडी तक पहुंचाने वाले किसान का पसीना जुड़ा था। जब वही सड़क दलदल बन जाए, तो मतदाता का यह कहना कि “वोट मांगने मत आइएगा”, कोई बगावत नहीं बल्कि लोकतंत्र का सबसे संवैधानिक और नैतिक अधिकार है।

एक वोट की कीमत, इतिहास के पन्नों से सत्ता को आईना

जो नेता सत्ता की कुर्सी पर बैठकर जनता के गुस्से को क्षणिक आक्रोश या बदजुबानी समझने की भूल करते हैं, उन्हें इतिहास के वे पन्ने पलटकर जरूर देखने चाहिए जहां ‘एक वोट’ ने बड़े-बड़े अभिमानी सूरमाओं के राजनीतिक वजूद को नेस्तनाबूद कर दिया। भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब जनता ने अपने एक-एक वोट की ताकत से तख्त और ताज को धूल चटा दी।

  • अटल बिहारी वाजपेयी और 1999 का ऐतिहासिक 1 वोट

संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा उदाहरण 17 अप्रैल 1999 को देखने को मिला था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार अविश्वास प्रस्ताव के दौरान महज ‘1 वोट’ से गिर गई थी। 269 के मुकाबले 270 मत। उस दिन पूरे देश और दुनिया ने देखा था कि संसदीय व्यवस्था में एक वोट का मूल्य क्या होता है। जब एक सांसद का एक वोट पूरे देश की सरकार को गिरा सकता है, तो सोचिए करोड़ों मतदाताओं के एक-एक वोट की सामूहिक ताकत सत्ता के किसी भी किले को ढहाने में कितनी सक्षम है।

  • सीपी जोशी, 2008 में जब 1 वोट ने छीन ली मुख्यमंत्री की कुर्सी

राजस्थान विधानसभा चुनाव 2008 की वह घटना राजनीति के छात्रों के लिए हमेशा एक सबक रहेगी। कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी, जिन्हें मुख्यमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था, नाथद्वारा सीट से भाजपा के कल्याण सिंह चौहान से महज 1 वोट से चुनाव हार गए थे। जोशी को 62,215 वोट मिले थे और उनके प्रतिद्वंद्वी को 62,216 वोट। कहा जाता है कि उस दिन उनके अपने परिवार के कुछ सदस्य मतदान करने नहीं पहुंचे थे। एक अकेले वोट ने एक कद्दावर नेता के हाथ से राज्य की कमान छीन ली।

  • इंदिरा गांधी और 1977 का जनाक्रोश

यह देश वह भी देख चुका है जब आपातकाल के अहंकार में चूर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली की जनता ने 1977 के आम चुनाव में 55 हजार से अधिक मतों से पराजित कर घर बैठा दिया था। ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ का नारा देने वालों को इस देश के अनपढ़, गरीब और फटेहाल मतदाता ने यह समझा दिया था कि इस मुल्क का असली मालिक कोई व्यक्ति या खानदान नहीं, बल्कि वोट डालने वाली अवाम है।

  • कर्नाटक और मध्य प्रदेश के स्थानीय समीकरण

2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में संदूर सीट से संतोष लाड महज 1 वोट से जीते थे। वहीं 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कई सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर 100 से 500 वोटों के बीच सिमट गया था, जिसने पूरे प्रदेश में सत्ता की दिशा और दशा बदल कर रख दी थी।

इतिहास की ये घटनाएं गवाही देती हैं कि मतदाता की खामोशी को उसकी कमजोरी समझने की भूल किसी भी राजनेता को कभी नहीं करनी चाहिए। आज गुना की सड़क पर उठा यह स्वर केवल एक व्यक्ति का नहीं है, यह उस पूरे मतदाता वर्ग का संकेत है जो अब झूठे नारों, वादों और प्रचार के आडंबर से ऊब चुका है।

गुना की जमीनी हकीकत और सिंधिया का राजनीतिक प्रभाव

गुना-शिवपुरी-अशोकनगर का अंचल पारंपरिक रूप से सिंधिया परिवार की राजनीतिक कर्मभूमि रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता स्व. माधवराव सिंधिया और स्वयं ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस क्षेत्र का लंबे समय तक संसद में प्रतिनिधित्व किया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में इसी गुना की जनता ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को पराजय का स्वाद चखाकर यह साफ संदेश दे दिया था कि जनता की निष्ठा किसी राजघराने या नाम की मोहताज नहीं होती, वह विकास और संवाद चाहती है।

हालांकि 2024 के आम चुनाव में जनता ने एक बार फिर उन पर विश्वास जताया और भारी मतों से जिताकर संसद भेजा, जिसके बाद उन्हें केंद्र में भारी-भरकम मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी मिली। लेकिन केंद्र और राज्य में सत्ता होने के बावजूद यदि आज भी ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सड़कों का टोटा है, तो जनता का यह सवाल पूछना पूरी तरह न्यायसंगत है।

जब क्षेत्र का प्रतिनिधि इतना ताकतवर हो, देश की सरकार में कैबिनेट मंत्री हो, उसके बाद भी अगर एक नागरिक को अपनी सड़क के लिए गिड़गिड़ाना पड़े या चेतावनी देनी पड़े, तो यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता और जनप्रतिनिधियों की जमीनी प्राथमिकताओं के भटकाव को उजागर करता है।

ब्रांडवाणी दृष्टिकोण, लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है

ब्रांडवाणी समाचार यह स्पष्ट मानता है कि लोकतंत्र किसी नेता की जागीर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर चलने वाला एक पवित्र अनुबंध है। नेता सेवक है और जनता मालिक। लेकिन बीते कुछ दशकों में राजनीति का चरित्र ऐसा विकृत हुआ है कि चुनाव जीतने के बाद नेता ‘शासक’ बन बैठते हैं और जनता ‘याचक’ की मुद्रा में आ जाती है।

गुना के उस मतदाता ने कोई असंवैधानिक बात नहीं कही। उसने सिर्फ इतना कहा कि जो सड़क नहीं दे सकता, उसे वोट मांगने का नैतिक अधिकार नहीं है। यह वाक्य लोकतंत्र की आत्मा है। यदि जनता अपने अधिकारों के लिए नेताओं की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछना बंद कर देगी, तो देश में लोकतंत्र का ढांचा तो रहेगा, लेकिन उसकी आत्मा मर जाएगी।

सत्ता में बैठे रसूखदारों को अब यह समझ लेना चाहिए कि जनता अब भाषणों से पेट नहीं भरती। उसे अपने बच्चों के लिए स्कूल चाहिए, बीमार बुजुर्गों के लिए अस्पताल चाहिए, रोजगार के अवसर चाहिए और चलने के लिए पक्की सड़क चाहिए। जनता की इस बुनियादी पीड़ा को नजरअंदाज करके विकास के चाहे जितने गुलाबी आंकड़े पेश कर दिए जाएं, जमीनी हकीकत धूल और कीचड़ में ही सनी रहेगी।

गुना का यह वाकया मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि समूचे देश के हुक्मरानों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज भी हुक्मरानों ने चौपालों से उठती इस बेबसी और गुस्से की आवाज को नहीं सुना, तो आने वाले कल में ईवीएम का एक-एक बटन उसी गुस्से की स्याही से सत्ता के अहंकार का फैसला लिखेगा। जनता जाग रही है, और जागती हुई जनता ही एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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