
मध्य प्रदेश के किसी भी कस्बे, चौराहे या जिला मुख्यालय से गुजरिए, विकास से पहले आपको विशालकाय होर्डिंग्स, मुस्कुराते राजनेताओं के कटआउट और बड़े-बड़े अक्षरों में छपे लोक-लुभावन दावों के अंबार दिखेंगे। सरकारी विज्ञापनों का यह दिखावटी संसार ऐसा आभास कराता है मानो समूचे प्रदेश में खुशहाली और समृद्धि की गंगा बह रही हो। लेकिन इस कृत्रिम चमक-दमक के पीछे का आर्थिक यथार्थ बेहद भयावह और चिंताजनक है। राज्य की वित्तीय सेहत पर गौर करें तो मध्य प्रदेश करीब 4 लाख करोड़ से अधिक के भारी-भरकम कर्ज के जाल में फंसा हुआ है।
हर महीने नए कर्ज उठाने की मजबूरी और दूसरी तरफ राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए खजाने से बांटी जा रही नकद योजनाओं की होड़—क्या यही लोकतांत्रिक विकास का मॉडल है? आज सबसे तीखा सवाल यही है कि क्या मध्य प्रदेश केवल नारों, पोस्टरों और सरकारी खजाने पर टिके प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के दम पर चल रहा है? क्या यह आत्मनिर्भरता का रास्ता है या फिर सत्ता की चाबी पाने के लिए जनता को स्वावलंबन से दूर कर एक स्थायी निर्भरता के दलदल में धकेलने का सोची-समझी योजना?
प्रत्यक्ष लाभ या चुनावी हथकंडा, स्वावलंबन बनाम खैरात की राजनीति
लोककल्याणकारी राज्य में गरीब और वंचित वर्ग को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा और चुनावी ‘रेवड़ी संस्कृति’ के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा होती है। आज ‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं के खातों में 1250 से 1500 रुपये डाले जा रहे हैं और राजनीतिक मंचों से इसे 3000, 4000 या 5000 रुपये तक बढ़ाने के वादे हवा में तैरते रहते हैं। यही नहीं, युवाओं और विद्यार्थियों को भी नकद भत्तों की किसी न किसी योजना में उलझाए रखने की रूपरेखा गढ़ी जाती है।
यहाँ मौलिक सवाल यह उठता है कि क्या 1500 रुपये की मासिक राशि से आज के दौर में किसी परिवार का वास्तविक उद्धार संभव है? वर्तमान महंगाई के इस युग में—जहाँ रसोई गैस, खाद्य तेल, दालें, दवाइयां और बच्चों की स्कूल फीस आसमान छू रही है—1500 रुपये एक पखवाड़े का बुनियादी खर्च भी नहीं उठा सकते। एक मध्यमवर्गीय परिवार का गुजारा जहाँ पचास हजार से एक लाख रुपये के मासिक बजट में सिमट रहा हो, वहाँ 1500 रुपये देकर यह दावा करना कि नारी शक्ति सशक्त हो गई, जमीनी हकीकत से मुंह चुराना है।
महिलाओं को वास्तव में आर्थिक शक्ति तब मिलती जब उन्हें स्थानीय स्तर पर लघु उद्योग, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्थायी बाजार, कौशल प्रशिक्षण और वित्तीय स्वायत्तता दी जाती। यदि महिलाओं को उत्पादन से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाया जाता, तो वे 1500 रुपये की सरकारी अनुकंपा की मोहताज नहीं रहतीं। लेकिन कुटीर उद्योग लगाने या उद्यमशीलता खड़ी करने में वर्षों की कड़ी मेहनत, सही नीति और प्रशासनिक इच्छाशक्ति लगती है; जबकि बैंक खातों में एक क्लिक पर नकद पैसा डालना चुनावी दृष्टि से सबसे आसान और त्वरित लाभ देने वाला रास्ता माना जाता है। यह नीति जनता को सशक्त बनाने की नहीं, बल्कि मतदाता को सरकारी खैरात की कतार में खड़े रखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।
कर्ज का दलदल और ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ की प्रशासनिक नीति
संस्कृत की एक प्राचीन उक्ति है—ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् (कर्ज लो और घी पियो)। मध्य प्रदेश की वर्तमान वित्तीय स्थिति इस कहावत को हूबहू चरितार्थ करती नजर आती है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य पर कर्ज का भार अप्रत्याशित गति से बढ़ा है। आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश पर कुल कर्ज चार लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है और हर साल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में निकल जाता है।
जब राज्य की आय का बड़ा हिस्सा ब्याज अदायगी और अनुत्पादक नकद वितरण योजनाओं में स्वाहा हो जाएगा, तो प्रदेश के पास वास्तविक पूंजीगत व्यय के लिए क्या बचेगा?
- क्या सरकारी मशीनरी ने कभी इस पर आत्ममंथन किया कि जो कर्ज आज लिया जा रहा है, उसे चुकाएगा कौन?
- क्या आने वाली पीढ़ियां केवल इसलिए जन्म लेंगी कि वे पिछली सरकारों द्वारा बांटी गई चुनावी रेवड़ियों का ब्याज चुका सकें?
हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर वित्तीय संकट के बीच भी सरकार की फिजूलखर्ची, आयोजनों, प्रचार अभियानों और नौकरशाही के ठाठ-बाट में कोई कमी नहीं आई है। वरिष्ठ नीति-निर्माता और प्रशासनिक अमला वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस बात की कार्ययोजना बनाता है कि अगला कर्ज किस वित्तीय संस्थान या बांड बाजार से उठाया जाए। राजनेता और उच्चाधिकारी विकास का ढिंढोरा पीटते हुए मलाईदार व्यवस्था का आनंद ले रहे हैं, जबकि आम नागरिक पर आने वाले वर्षों में अप्रत्यक्ष करों, महंगी बिजली, महंगे पेट्रोल-डीजल और बदहाल नागरिक सुविधाओं का चाबुक चलना तय है।
बीमारू राज्य का भूत और बुनियादी ढांचे की उपेक्षा
दो दशक पहले मध्य प्रदेश को ‘बीमारू’ राज्यों की श्रेणी से बाहर निकालने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। निस्संदेह कुछ क्षेत्रों में सड़कों और कृषि विकास में प्रगति हुई, परंतु आज फिर वही सवाल नए कलेवर में सामने खड़ा है। आज भी प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सड़कों की हालत बरसात आते ही गड्ढों में तब्दील हो जाती है। जिला स्तर के अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, सोनोग्राफी और एमआरआई मशीनों पर ताले लटके हैं और मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों की लूट का शिकार होना पड़ता है।
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं, बुनियादी प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों का अभाव है। रेल संपर्क और लॉजिस्टिक्स के मोर्चे पर प्रदेश को औद्योगिक केंद्र के रूप में जिस तेजी से विकसित होना चाहिए था, वह गति सुस्त है। जब राज्य का बजट बुनियादी ढांचे—जैसे बेहतर हाईवे, एक्सप्रेसवे, आधुनिक औद्योगिक गलियारे, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य संरचना—पर खर्च होने के बजाय केवल चुनावी योजनाओं में झोंक दिया जाएगा, तो राज्य का फिर से आर्थिक रूप से पंगु और बीमारू बनना अवश्यंभावी है। बुनियादी ढांचे पर किया गया खर्च संपत्ति और रोजगार पैदा करता है, जबकि राजनीतिक लाभ के लिए बांटी गई नकद राशि उपभोग में खत्म होकर केवल मुद्रास्फीति को हवा देती है।
युवा शक्ति, रोजगार की गारंटी चाहिए, भत्ते की बैसाखी नहीं
किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसका युवा होता है। मध्य प्रदेश का युवा आज सबसे अधिक ठगा हुआ महसूस कर रहा है। पटवारी भर्ती, शिक्षक पात्रता परीक्षा, पुलिस आरक्षक और लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं की विसंगतियां, घोटालों के आरोप और वर्षों तक लटकी रहने वाली परिणाम प्रक्रिया ने शिक्षित युवाओं की कमर तोड़ दी है।
लाखों युवा जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी, माता-पिता की गाढ़ी कमाई और सपने झोंक रहे हैं, उन्हें सरकार से रोजगार चाहिए, किसी योजना का 2000 या 5000 रुपये का भत्ता नहीं। नकद सहायता स्वाभिमानी युवा के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती है। युवा वर्ग भीख या अनुदान नहीं मांग रहा, वह अपने पसीने की कीमत और अपनी योग्यता के अनुसार अवसर मांग रहा है।
जब प्रदेश में बड़े उद्योग नहीं आएंगे, आईटी हब केवल फाइलों में तैरेंगे, विनिर्माण क्षेत्र में निवेश जमीन पर नहीं उतरेगा, तो डिग्रियां लेकर घूमने वाले युवा हताश होकर पलायन करने पर मजबूर होंगे। युवाओं को कौशल आधारित प्रशिक्षण, नए स्टार्टअप्स के लिए सुलभ ऋण और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया चाहिए। युवाओं को ‘कौशल सीखो’ या भत्ते की बैसाखियां थमाकर सरकार अपने दायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकती।
जनचेतना की परीक्षा, क्या स्वाभिमान जागेगा?
लोकतंत्र में सरकारों की दिशा और नीतियां जनता के विवेक से तय होती हैं। जब तक जनता महज कुछ सौ या हजार रुपयों के तात्कालिक लाभ के बदले अपना वोट बेचती रहेगी, तब तक राजनीतिक दल स्थायी विकास और रोजगार सृजन की कठिन राह पर चलने से बचते रहेंगे। वे हमेशा आसान रास्ता चुनेंगे—खजाने से नकद बांटो, चुनाव जीतो और फिर कर्ज का बोझ जनता की जेब पर डाल दो।
अब समय आ गया है कि मध्य प्रदेश की जनता, विशेषकर प्रदेश के जागरूक युवा और स्वाभिमानी बहनें इस मायाजाल को समझें:
- महिलाओं को यह विचार करना होगा कि क्या महीने के 1500 रुपये उनके बच्चों के अंधकारमय भविष्य, बदहाल स्कूलों और महंगी स्वास्थ्य सेवाओं की भरपाई कर सकते हैं?
- युवाओं को यह सवाल उठाना होगा कि उन्हें सरकारी दफ्तरों में पारदर्शी नौकरियां और प्रदेश में उद्योग चाहिए या केवल चुनाव पूर्व घोषित होने वाले तात्कालिक भत्ते?
- करदाताओं को यह पूछना होगा कि उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा प्रदेश के बुनियादी ढांचे के निर्माण में लग रहा है या फिर सत्ताधीशों के राजनीतिक विज्ञापनों और चुनावी सौगातों में फूंका जा रहा है?
‘ब्रांडवाणी समाचार’ की कलम हमेशा सत्ता के सामने जनहित का आईना रखने के लिए प्रतिबद्ध रही है। सरकार और उसके नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि पोस्टर और होर्डिंग्स से विकास की तस्वीरें तो चमकाई जा सकती हैं, लेकिन खोखली हो रही अर्थव्यवस्था का सच छिपाया नहीं जा सकता। पांच लाख करोड़ के कर्ज की दहलीज पर खड़े प्रदेश को आज चुनावी खैरात के शॉर्टकट की नहीं, बल्कि कठोर वित्तीय अनुशासन, औद्योगिक क्रांति, कृषि आधारित प्रसंस्करण इकाइयों और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था की सख्त जरूरत है।
यदि सत्ता और उसके शीर्ष अधिकारी कर्ज लेकर घी पीने की इस आत्मघाती नीति से बाज नहीं आए, तो इतिहास उन्हें एक समृद्ध राज्य को आर्थिक पराधीनता के दलदल में धकेलने का जिम्मेदार ठहराएगा। मध्य प्रदेश को स्वावलंबी, समर्थ और विकसित बनाना है, तो खैरात की राजनीति को तिलांजलि देकर युवाओं के हाथों को काम और बहनों को वास्तविक उद्यम शक्ति देनी होगी। यही कलम की धार है, और यही आज के मध्य प्रदेश की पुकार है।








