
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार अब कोई अपवाद या संयोग नहीं, बल्कि व्यवस्था की एक स्थायी और चरम परिणति बन चुका है। हाल ही में उजागर हुआ नगरीय प्रशासन विभाग का 250 करोड़ रुपये का उपकरण खरीदी घोटाला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्रदेश में घोटालेबाजी अपनी सारी हदें पार कर चुकी है। कभी लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) में तो कभी नगरीय प्रशासन में, एक के बाद एक सामने आते ये मामले स्पष्ट करते हैं कि राज्य का खजाना अब चंद भ्रष्ट अधिकारियों और राजनेताओं की तिजोरी भरने का साधन मात्र बनकर रह गया है। जनता को फ्री बाँट कर व्याज के साथ उनसे वसूल किया जा रहा है
यदि प्रदेश में ये सुनियोजित घोटाले न हो रहे होते, तो रातों-रात नौकरशाहों और नेताओं की संपत्तियों में यह बेतहाशा वृद्धि कैसे संभव होती? आज मध्य प्रदेश में जमीनों के दाम जो आसमान छू रहे हैं, उसका मूल कारण यही काला धन है जिसे रियल एस्टेट में खपाया जा रहा है। आम आदमी के पास अपना घर बनाने तक का पैसा नहीं है, जबकि सत्ता के करीब बैठे लोग और अधिकारी अलग-अलग नामों से बेनामी संपत्तियां खरीद रहे हैं। स्थिति यह है कि कागजों पर उदाहरण स्वरूप कभी रमेश तो कभी दिनेश के आधार कार्ड लगाकर धड़ल्ले से जमीनों की रजिस्ट्री हो रही है। इस 250 करोड़ के नगरीय प्रशासन घोटाले ने मध्य प्रदेश की छवि को जिस तरह धूमिल किया है, वह पोस्टर, बैनर और विज्ञापनों की चमक के पीछे छिपे काले सच को उजागर करता है।
आश्चर्य का विषय यह है कि विपक्ष इन मुद्दों को भुनाने और जनता की आवाज बनने में पूरी तरह विफल रहा है। यदि राज्य में हुए घोटालों की वास्तविक सूची जारी की जाए, तो शायद कागजों के पन्ने कम पड़ जाएंगे। भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान सरकार केवल और केवल मुफ्त की योजनाओं (फ्रीबीज) के सहारे अपनी सत्ता को बनाए रखने का प्रयास कर रही है। परंतु इन मुफ्त की योजनाओं का आर्थिक बोझ अंततः आम जनता की ही कमर तोड़ रहा है। सरकार एक हाथ से जनता को 1500 रुपये थमाती है, और दूसरे हाथ से बेतहाशा महंगाई बढ़ाकर हजारों रुपये ब्याज सहित वसूल लेती है। आज महंगाई अपने उस चरम पर पहुंच चुकी है, जिसकी आम आदमी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जो सरकारी संस्था मे काम कर रहे उनको छोड़ दिया जाए तो करोड़ों लोगों के घर मे शाम को क्या बनेगा पता नहीं माध्यम परिवार का हर एक व्यक्ति इस महगाई मे गरीबी रेखा मे आता जा रहा है घोटालों को अंजाम देने वाले ये अधिकारियों और नेताओ की मानवता खतम हो गई है और इनके पाप इतने बढ़ गए है की बाद मे ये इन पापों को कम करने के लिए मंदिरों के चक्कर लगते फिरते है क्या ये करोड़ों लोगों के घर का मुह के निवालों मे खेल करने वाले इस भ्रष्टाचारियों को उन गरीबों की आह से भगवान के मंदिर से कुछ छूट मिलेगी या भगवान पूरी सजा देंगे ये उन भ्रष्ट लोगों को ही पता होगा
इस पूरी व्यवस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका पर भी अब गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होने लगे हैं। जो संगठन कभी समाज हित, राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के लिए जाना जाता था, आज उस पर सत्ता के इर्द-गिर्द पनप रहे भ्रष्टाचार को मूक समर्थन देने के आरोप लग रहे हैं। जो आरएसएस कल तक समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले प्रचारकों की खान हुआ करता था, आज उसकी गोद में केवल अवसरवादी और स्वार्थी तत्व बैठे नजर आते हैं। संगठन का दायरा अब केवल चंद रसूखदार लोगों तक सिमट कर रह गया है। बड़े पदाधिकारी इन गिने-चुने लोगों के लिए सुरक्षा कवच बनकर बैठे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाले साधारण कार्यकर्ताओं की स्थिति दयनीय है। अपितु ये बड़े पदाधिकारी फोन तक नहीं उठाते है सखाओ और कार्यक्रम मे भीड़ के समय पर बस ये ऐसा दिखाते है जैसे ये समाज के सबसे बड़े मार्गदर्शक है समाज पर अपनी प्रतिस्पर्धा को जमाने के लिए इन लोगों ने शिक्षा जगत को सरकारी तंत्र को हमेशा अपनी सीढ़ी की तरह उपयोग किया क्युकी वह से बहुत बड़े लेवल मे लोग जुड़ते है पर आज का युवा समझ चुका है की ये एक खेल है सत्ता पर काबिज रहने का भारत का युवा कल का समाज है और आज का जेन-जी भी ये वो जेन-जी है जो देश की रीड़ की हड्डी है और कल का सम्मान भी है।
आज स्थिति यह है कि जो युवा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से निस्वार्थ भाव से जुड़ते हैं, वे 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद मोहभंग का शिकार होकर दूर भाग जाते हैं। उन्हें यह कड़वी सच्चाई समझ आ जाती है कि वे संगठन के लिए कितना भी पसीना बहा लें, लेकिन विपरीत परिस्थिति या बीमारी में उन्हें एक पेरासिटामोल की गोली तक नसीब नहीं होने वाली। आरएसएस के बड़े पदाधिकारी चंद रसूखदार को छोड़कर अब इनकी कोई चिंता नहीं करने वाले है और विडंबना यह है कि शीर्ष नेतृत्व को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दस पुराने और कर्मठ लोग संगठन छोड़कर जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि भारत की विशाल जनसंख्या में से बीस नए युवा उनके स्थान पर आ जाएंगे। उनको पता है इतनी बड़ी देश की आबादी है की जो छोड़ कर गए भी तो उससे अधिक लोग जुड़ जाएंगे पर यह नहीं पाता की जो छोड़कर जा रहे है वही आपकी तकलीफ का कारण होंगे जैसे काँग्रेस का संगठन बिखर गया और सब देखते रह गए वैसे ही इसको ढेर होने मे थोड़ा ही समय लगेगा जो संगठन कभी समाज के उत्थान के लिए कार्य करता था, वह अब कथित रूप से केवल अवसरों की तलाश में समाज को घेरने वाले एक तंत्र में परिवर्तित होता प्रतीत हो रहा है।
ब्रांडवाणी समाचार की इस समीक्षा का निष्कर्ष यही है कि मध्य प्रदेश आज एक दोराहे पर खड़ा है, जहां एक ओर विकास के खोखले दावे और मुफ्त की रेवड़ियां हैं, वहीं दूसरी ओर बेलगाम भ्रष्टाचार, बेतहाशा महंगाई और वैचारिक पतन का अंधकार है। जब तक आम जनता इन हथकंडों को समझकर कड़े सवाल पूछना शुरू नहीं करती, तब तक घोटालों की यह फेहरिस्त यूं ही लंबी होती रहेगी। देखना है जनता को 1500 से 3000 मे बिकना है या फिर नई सरकार को ये बताना है की हम बिकते नहीं है मध्यप्रदेश का स्वाभिमान है और आगे अब इस कर्ज का घी पी कर महगाई नहीं बढ़ाएंगे।








