
एमपी का ‘खनिज‘ बना माफिया का ‘स्वर्ग‘: क्या अफसरों और नेताओं की भूख खत्म करेगी प्रदेश का भविष्य?
भोपाल। मध्य प्रदेश, जिसे प्रकृति ने बेशकीमती खनिज संपदा से नवाजा है, आज उसी संपदा के कारण भ्रष्टाचार और दलाली के दलदल में धंसा हुआ है। राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाला खनन क्षेत्र आज चंद रसूखदारों, भ्रष्ट अधिकारियों और राजनीतिज्ञों की ‘कमाई का अड्डा’ बन गया है। आलम यह है कि जायज तरीके से व्यापार करने वाला बिजनेसमैन आज सिस्टम की प्रताड़ना से त्रस्त है।
दलाली के चक्रव्यूह में फंसा उद्यमी
मध्य प्रदेश के खनिज संसाधनों पर आज पुलिस, राजस्व विभाग और स्थानीय राजनीति का ऐसा पहरा है, जिसका उद्देश्य सुरक्षा नहीं बल्कि ‘वसूली’ है। ईमानदारी से काम करने वाले व्यापारियों का कहना है कि हर कदम पर दलाली तय है। यदि कोई नियमों के तहत काम करना चाहे, तो उसे लालफीताशाही और फर्जी जांचों के जाल में फंसाकर काम रोकने की धमकी दी जाती है।
“व्यापारी का मुनाफा उसकी मेहनत से नहीं, बल्कि सिस्टम की ‘सेटिंग‘ से तय होने लगा है।”
बड़े चेहरे, बड़े साम्राज्य और ‘बीमारू‘ होता प्रदेश
प्रदेश के सबसे बड़े माफिया कोई और नहीं, बल्कि वे जिम्मेदार अधिकारी और नेता हैं जिन्होंने अपनी तिजोरियां भरने के लिए राज्य के विकास को दांव पर लगा दिया है। करोड़ों की आबादी वाला यह राज्य आज भी ‘बीमारू’ और ‘बेरोजगार’ की श्रेणी में खड़ा है, क्योंकि यहां निवेश करने वाले उद्यमियों को डराकर भगा दिया जाता है।
नेताओं और अफसरों को यह समझने की जरूरत है कि इंसान की बुनियादी जरूरतें—दो वक्त की रोटी और एक छोटा सा मकान—सीमित हैं। लूट-खसोट से महल और साम्राज्य तो खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन वे करोड़ों लोगों की बदहाली की नींव पर टिके होते हैं।
सोच का विकास ही असली विकास
मध्य प्रदेश को प्रगति की राह पर ले जाने के लिए सड़कों और इमारतों से पहले, यहां के नीति-निर्धारकों की सोच का विकास होना अनिवार्य है। अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल फाइलें दबाना या वसूली करना नहीं, बल्कि जनता का भला करना है। जब तक सिस्टम बिजनेसमैन को ‘शिकार’ समझना बंद नहीं करेगा, तब तक प्रदेश में रोजगार और खुशहाली का सपना अधूरा रहेगा।









