
मध्य प्रदेश अब विकास की राह पर नहीं, बल्कि कर्ज के अंतहीन दलदल में धंस चुका है। राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि अब प्रदेश का कुल कर्ज उसके सालाना बजट को भी पार करने वाला है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ‘रेवड़ी संस्कृति’ और वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव की ‘उधारी प्रबंधन’ की नीति ने मिलकर प्रदेश के हर नागरिक के भविष्य को गिरवी रख दिया है।
बर्बादी का गणित: बजट 4.65 लाख करोड़, कर्ज 5 लाख करोड़ के पार
पहली बार मध्य प्रदेश के इतिहास में ऐसा काला अध्याय लिखा जा रहा है, जहां सरकार की कमाई और बजट से ज्यादा उस पर उधारी का बोझ है।
● नया कर्ज सिर्फ किश्त चुकाने के लिए: कड़वा सच यह है कि सरकार अब विकास के लिए नहीं, बल्कि पुराने कर्ज का ब्याज और किश्त (Installments) भरने के लिए नया कर्ज ले रही है।
● 6 साल में 3 गुना उछाल: साल 2020-21 में जो सालाना कर्ज 31,686 करोड़ था, वह 2026-27 तक 1.10 लाख करोड़ पहुंचने का अनुमान है।
शिवराज की ‘लाड़ली‘ योजना और मोहन का ‘मेंटेनेंस‘ भारी पड़ा
विशेषज्ञों का मानना है कि लोक–लुभावन योजनाओं ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है:
● लाड़ली बहना का बोझ: इस योजना पर सालाना 23 हजार करोड़ खर्च हो रहे हैं।
● वेतन और भत्ते: कर्मचारी–पेंशनरों के वेतन पर 90 हजार करोड़ का खर्च है।
● ब्याज का चक्रव्यूह: इस साल सरकार ने 58,616 करोड़ रुपये सिर्फ पुराने कर्ज की किश्त और ब्याज चुकाने में लुटा दिए।
जब सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्याज भरने में चला जाएगा, तो प्रदेश के बच्चों के लिए स्कूल, मरीजों के लिए अस्पताल और युवाओं के लिए सड़कें बनाने का पैसा कहां से आएगा? यह सीधे तौर पर आम जनता के साथ विश्वासघात है।
कर्ज का दलदल: देश की कुल उधारी में एमपी का 5% हिस्सा
आरबीआई की रिपोर्ट डराने वाली है। मार्च 2026 तक मध्य प्रदेश की देनदारी 5.31 लाख करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। देश के सभी राज्यों की कुल उधारी में अकेले मध्य प्रदेश का हिस्सा 5% से अधिक हो चुका है। 19 सालों में प्रदेश का कर्ज 10 गुना बढ़ गया है।
आम नागरिक पर क्या होगा असर?
● महंगाई की मार: कर्ज चुकाने के लिए सरकार टैक्स और वैट (VAT) बढ़ा सकती है।
● बुनियादी ढांचे की कमी: नई सड़कों और पुलों का निर्माण ठप हो सकता है।
● रोजगार का संकट: नए उद्योगों को सब्सिडी देने के लिए सरकार के पास बजट नहीं बचेगा।







