
क्या सत्ता के नशे में चूर नेता भूल गए संसदीय मर्यादा? उमंग सिंघार के अपमान को जनता ने खुद से जोड़ा।
भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, आज एक ऐसे बयान की गवाह बनी जिसने विधायी परंपराओं और भाषाई मर्यादा को तार–तार कर दिया। सूबे के कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को ‘औकात‘ दिखाने की बात कहना न केवल एक व्यक्ति का अपमान है, बल्कि उन लाखों मतदाताओं की साख पर सवाल है जिन्होंने उन्हें चुनकर सदन में भेजा है।
सत्ता का ‘बुलडोजर‘ या शब्दों की अमर्यादा?
विधानसभा सत्र के दौरान जब जनहित के मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी, तब विजयवर्गीय का यह तल्ख तेवर देख हर कोई सन्न रह गया। सवाल यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की मौजूदगी में सरकार इसी ढर्रे पर चलेगी?
● जनता का अपमान: नेता प्रतिपक्ष कोई व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि विपक्ष की सामूहिक आवाज होता है। उनकी ‘औकात‘ पूछना सीधे तौर पर प्रदेश की उस जनता की हैसियत पर सवाल उठाना है, जिसने लोकतंत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की है।
● अध्यक्ष की चुप्पी: सदन के संरक्षक नरेंद्र सिंह तोमर से उम्मीद थी कि वे इस तरह की असंसदीय भाषा पर तत्काल अंकुश लगाएंगे, लेकिन सत्ता पक्ष के तीखे तेवरों ने सदन की गरिमा को हाशिए पर धकेल दिया है।
बड़ा सवाल: क्या भाजपा ने पार कर दी हैं सारी हदें?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रचंड बहुमत के बाद भाजपा के कुछ नेताओं में ‘अजेय‘ होने का जो भाव आया है, वह अब अहंकार का रूप ले चुका है।
जब तर्क खत्म हो जाते हैं, तो अहंकार जन्म लेता है। विधानसभा में ‘औकात‘ जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ता अब संवाद में नहीं, बल्कि दमन में विश्वास रख रही है।







