
भोपाल/दिल्ली: वन विभाग के मुखिया की कुर्सी के लिए चला ‘सियासी ड्रामा‘ आखिरकार पटाक्षेप पर पहुंच गया है। विभाग के गलियारों में महीनों से मची हलचल अब सन्नाटे में बदल गई है, क्योंकि बाजी उस खिलाड़ी ने मारी है जिसके खिलाफ बिसात पर सबसे ज्यादा प्यादे बिछाए गए थे।
वरिष्ठता का गुमान और ‘शिकायतों‘ का पुलिंदा कहानी शुरू होती है विभाग की सबसे ऊंची कुर्सी से। सूत्र बताते हैं कि एक सीनियर आईएफएस (IFS) साहब खुद को इस पद का इकलौता हकदार मानकर बैठे थे। लेकिन जैसे ही हवा का रुख बदला, उन्होंने मर्यादाओं को ताक पर रखकर ‘मोर्चा‘ खोल दिया। शिकायतों की ऐसी फाइलें तैयार की गईं जो प्रदेश से लेकर देश की राजधानी यानी दिल्ली तक पहुंचाई गईं। मंशा साफ थी—सामने वाले की राह में इतने कांटे बिछा दो कि वह रेस से ही बाहर हो जाए।
दांव पड़ा उल्टा, ‘साहब‘ हुए चित कहते हैं राजनीति में हर दांव कामयाब नहीं होता। शिकायतों का शोर तो खूब हुआ, लेकिन नतीजा ‘ढाक के तीन पात‘ रहा। जिस अधिकारी को घेरने के लिए शिकायतों का चक्रव्यूह रचा गया था, उन्होंने न केवल उसे भेद दिया बल्कि आज उसी ‘मुखिया की कुर्सी‘ पर विराजमान भी हो गए।
विरोधियों की उड़ी नींद, रिटायरमेंट की दहलीज पर कतार इस नियुक्ति ने विभाग में एक बड़ा ‘सर्जिकल स्ट्राइक‘ कर दिया है। नए मुखिया का कार्यकाल लंबा होने के कारण अब उन दावेदारों के पसीने छूट रहे हैं जो रिटायरमेंट तक इसी कुर्सी के सपने देख रहे थे। अब आलम यह है कि इंतजार करते–करते कई साहब तो बिना कुर्सी छुए ही घर (रिटायर) लौट जाएंगे।
कैंप में सन्नाटा, रणनीतिकार हुए भूमिगत शिकायत करने वाले ‘साहब‘ के खेमे में अब ऐसा सन्नाटा है जैसे किसी ने मातम की चादर ओढ़ ली हो। जिस शिकायत को सबसे बड़ा हथियार बनाया गया था, वही अब गले की हड्डी बन गई है। साफ संदेश है—प्रशासनिक गलियारों में केवल ‘साजिशें‘ काम नहीं आतीं, किस्मत और काबिलियत का अपना ही वजन होता है।
महकमे में अब चर्चा इस बात की नहीं है कि कौन जीता, बल्कि इस बात की है कि ‘शिकायतें‘ करने वालों का अब क्या होगा? क्या नए मुखिया पुराने हिसाब चुकता करेंगे या ‘माफ करो और भूल जाओ‘ की नीति अपनाएंगे?







