
ब्यूरो, राज्य डेस्क | मध्य प्रदेश के बारे में अक्सर कहा जाता है— “अजब है, सबसे गजब है।“ लेकिन यह ‘गजब‘ अब प्रशासनिक लापरवाही का नया रिकॉर्ड बना रहा है। एक आदिवासी बाहुल्य जिला इन दिनों बिना ‘मुखिया‘ के चल रहा है। जिला कप्तान (SP) को रिटायर हुए एक महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन सरकार की नींद है कि टूटने का नाम नहीं ले रही।
कुर्सी खाली, फाइलें ‘हवा‘ में!
हैरानी की बात यह है कि जिले के सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई है। ऑफिस की कुर्सी धूल फांक रही है, फाइलें टेबल दर टेबल घूम रही हैं, लेकिन जिम्मेदारी किसकी है? यह सवाल फिलहाल हवा में तैर रहा है। क्या सरकार को इस बात की खबर भी है कि एक संवेदनशील जिला बिना किसी पुलिस कप्तान के चल रहा है?
मुख्यमंत्री का दौरा और सुरक्षा का ‘शून्य‘ गणित
विडंबना देखिए, इसी जिले में जल्द ही ‘कृषि कैबिनेट‘ की बड़ी बैठक होने वाली है। मुख्यमंत्री से लेकर पूरी कैबिनेट और शासन के आला अफसरों का जमावड़ा लगने वाला है। तैयारियां युद्ध स्तर पर जारी हैं, टेंट लग रहे हैं, सड़कें चमकाई जा रही हैं, लेकिन सुरक्षा की कमान संभालने वाला मुख्य सेनापति ही गायब है।
बड़ा सवाल: जब मुख्यमंत्री और पूरी सरकार जिले में होगी, तब सुरक्षा का जिम्मा किसके कंधों पर होगा? क्या प्रभारी अधिकारियों के भरोसे इतनी बड़ी वीवीआईपी मूवमेंट को सुरक्षित माना जा सकता है?
सत्ता के गलियारों में सुगबुगाहट: ‘चूक‘ या ‘पसंद‘ का फेर?
राजधानी के गलियारों में अब कानाफूसी तेज हो गई है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही (Slight Oversight) है या फिर पर्दे के पीछे किसी खास नाम को फिट करने की ‘सेटिंग‘ चल रही है? क्या किसी चहेते अफसर के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही, जिसके चक्कर में पूरे जिले की सुरक्षा को दांव पर लगा दिया गया है?
आदिवासी क्षेत्रों में कानून व्यवस्था वैसे ही चुनौतीपूर्ण होती है। ऐसे में एक महीने तक जिले को ‘लावारिस‘ छोड़ देना शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। अब देखना यह है कि ‘कृषि कैबिनेट‘ से पहले सरकार को ‘कप्तान‘ की याद आती है या फिर यह जिला ऐसे ही ‘अजब–गजब‘ ढर्रे पर चलता रहेगा।







