
विधानसभा में जो पद के अयोग्य बताए गए, उनके रसूख के आगे नतमस्तक हुआ मंत्रालय! मुख्यमंत्री कार्यालय के ‘विशेष सांध्य’ ने छीनी उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार और एसीएस अनुपम राजन की ताकत? ब्रांडवाणी समाचार का बड़ा राजनीतिक विस्फोट।
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों से लेकर वल्लभ भवन के गलियों तक आज एक ही कहावत गूंज रही है—”सैयां भए कोतवाल, अब डर काहे का!” जब देश और प्रदेश की सबसे शक्तिशाली व्यवस्था यानी मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ही किसी दागी और विवादित चेहरे के लिए अभय कवच बन जाए, तो फिर नियम, कायदे, मंत्री और विभाग के मुखिया की हैसियत सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह जाती है।
मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. सुनील मंडेलिया के मामले में यह कहावत आज सौ फीसदी सटीक साबित हो रही है। लोकायुक्त के गंभीर आरोपों और चौतरफा विवादों के बाद भी शासन उनके सामने पूरी तरह बौना और लाचार नजर आ रहा है।
यह अब कोई दबी-छिपी बात नहीं रही कि डॉ. सुनील मंडेलिया को मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री निवास का सीधा सांध्य और वरदहस्त प्राप्त है। जब सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र ही किसी पर इस कदर मेहरबान हो, तो फिर उच्च शिक्षा विभाग के मुखिया और अपर मुख्य सचिव (ACS) अनुपम राजन के आदेश और उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार की फाइलें रद्दी के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं रह जातीं।
सवाल यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री कार्यालय ने जानबूझकर अपने ही कैबिनेट मंत्री और इतने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को एक रजिस्ट्रार के सामने छोटा और असहाय बना दिया है?
विडंबना देखिए, जिसे देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर यानी मध्य प्रदेश विधानसभा के पटल पर भी रजिस्ट्रार पद के लायक नहीं माना गया, जिसके खिलाफ अयोग्यता के तथ्य सामने आ चुके हैं, आज उसकी ताकत के आगे पूरा प्रशासनिक अमला शून्य हो चुका है। विभाग घुटनों पर है, नियम ठंडे बस्ते में हैं, और पूरी व्यवस्था एक अकेले अधिकारी के रसूख के आगे नतमस्तक खड़ी है। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि मध्य प्रदेश में अब योग्यता या शुचिता की नहीं, बल्कि ‘पॉलिटिकल गॉडफादर’ की पूजा हो रही है।
जब खुद ‘कोतवाल’ यानी सीएमओ ही रक्षक की भूमिका में आ जाए, तो डॉ. सुनील मंडेलिया भला क्यों अपर मुख्य सचिव या किसी मंत्री के आदेशों की परवाह करेंगे? 15 जून की ट्रांसफर डेडलाइन सिर पर है, लेकिन मंत्रालय के भीतर की सुगबुगाहट बताती है कि इस रसूखदार अफसर को हिलाने की हिम्मत फिलहाल किसी में दिखाई नहीं दे रही है। विभाग पूरी तरह झुक चुका है और मंत्री-सचिव सिर्फ मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रहे हैं।
ब्रांडवाणी समाचार पूरी जिम्मेदारी के साथ यह सवाल उठा रहा है कि क्या एक विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार का रसूख, मध्य प्रदेश सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों से भी बड़ा है? क्या मुख्यमंत्री की कथनी और करनी का यह अंतर जनता के भरोसे पर चोट नहीं है? जवाब का इंतजार पूरे सूबे को है।
“जब रक्षक ही बन जाए रसूख का ढाल, तो नियम-कायदों का होना तय है बेहाल! विधानसभा में जो अयोग्य, वो आज मंत्रियों और अफसरों पर भारी। देखिए, कैसे एक रजिस्ट्रार के आगे बौना हुआ मध्य प्रदेश का पूरा सिस्टम, सिर्फ ब्रांडवाणी समाचार पर।”
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