एमपी बीजेपी में ‘वर्चस्व’ की जंग: मोहन यादव बनाम ‘दिग्गज’, क्या ये आर-पार की लड़ाई है?

मध्य प्रदेश की राजनीति से इस वक्त एक ऐसी खबर आ रही है जो गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सत्ता संभाले वक्त तो बीत चुका है, लेकिन सवाल ये है कि क्या पार्टी के भीतर उन्हें वो ‘कमान‘ मिली है जिसके वो हकदार हैं? या फिर एमपी बीजेपी के ‘बड़े सूरमा‘ अब भी उन्हें अपना ‘आका‘ मानने को तैयार नहीं हैं? आज हम बात करेंगे उस अंतर्कलह की, जो बाहर तो कम दिखती है, लेकिन अंदर ही अंदर ज्वालामुखी की तरह धधक रही है।“

मुख्य बिंदु:

●     अस्तित्व की लड़ाई: मध्य प्रदेश में एक तरफ डॉ. मोहन यादव की नई कार्यशैली है, तो दूसरी तरफ दशकों से जमे वो दिग्गज नेता हैं जिन्हें ‘कमान‘ किसी और के हाथ में देखना रास नहीं आ रहा। क्या ये दिग्गज मोहन यादव को स्वीकार नहीं कर पा रहे, या मुख्यमंत्री खुद को स्थापित करने में कड़े फैसले नहीं ले पा रहे?

●     दूरी या मजबूरी: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर एक ऐसा गुट सक्रिय है जो मुख्यमंत्री के हर फैसले को बारीकी से तौल रहा है। जिस तरह के ‘तीखे प्रहार‘ भीतरखाने हो रहे हैं, उससे एक बात साफ है—मप्र की राजनीति में सब कुछ ‘ऑल इज वेल‘ तो कतई नहीं है।

शक्ति प्रदर्शन का खेल: अब सवाल ये उठता है कि भविष्य की तस्वीर क्या होगी? क्या ये पुराने दिग्गज

●     एकजुट होकर मोहन यादव की राह में कांटे बिछाएंगे और उन्हें हटाने की बिसात बिछाएंगे? या फिर डॉ. मोहन यादव अपनी ‘मोहन नीति‘ से इन बड़ों को हाशिए पर धकेल कर अपनी अलग लकीर खींचेंगे?

●     अनुशासन का मुखौटा: बीजेपी अपनी अनुशासनप्रिय छवि के लिए जानी जाती है, लेकिन एमपी में ये मुखौटा अब दरकता नजर आ रहा है। अपनों के ही वार मुख्यमंत्री की कुर्सी को हिलाने की कोशिश कर रहे हैं या ये सिर्फ एक ‘ट्रांजिशन फेज‘ है?

“सियासत में कोई किसी का सगा नहीं होता, और मध्य प्रदेश की ये अंदरूनी जंग इस बात की तस्दीक कर रही है। देखना ये होगा कि ‘मोहन‘ की बांसुरी पर ये दिग्गज थिरकते हैं या फिर सुर और ताल दोनों बिगड़ने वाले हैं। ये वर्चस्व की लड़ाई है, जिसमें या तो ‘कुर्सी‘ बचेगी या फिर ‘कद‘ घटेगा।“

  • gaurav singh rajput

    gaurav singh rajput

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