सत्ता की चकाचौंध में हाशिए पर ‘ईमानदारी’, धीरज पटेरिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनदेखी पर शाह-मोदी की बीजेपी का ‘मौन’ क्यों?

राजनीति में निष्ठा, समर्पण और संगठन के प्रति जीवन खपा देने की कीमत आज के दौर में क्या रह गई है? क्या वर्षों तक दरी उठाने वाले, वैचारिक रूप से पार्टी को सींचने वाले नेताओं को आज सिर्फ ‘इस्तेमाल’ करके छोड़ दिया जाता है? मध्य प्रदेश और विशेषकर महाकौशल की राजनीति में इस समय यह सवाल एक सुलगती हुई बहस बन चुका है। चर्चा के केंद्र में हैं—भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ और जमीनी नेता धीरज पटेरिया और उनके साथ ही हाशिए पर धकेली जा रही संगठन की ‘मातृ संस्था’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)।

यह रिपोर्ट किसी एक नेता की उपेक्षा की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बदलते राजनीतिक चरित्र का आईना है, जिसने दो सीटों वाली बीजेपी को ‘विश्व की सबसे बड़ी पार्टी’ बनाने वाले कार्यकर्ताओं और संघ के वैचारिक आधार को ही किनारे लगा दिया है।

जब अमित शाह को आना पड़ा था मनाने, आज क्यों बनाई दूरी?

धीरज पटेरिया महाकौशल क्षेत्र का वो चेहरा हैं जिनका जनाधार किसी परिचय का मोहताज नहीं है। जब उन्होंने पार्टी से असंतुष्ट होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का संकेत दिया था, तब वे बिना किसी सिंबल के भी 30,000 से अधिक वोट लाने का माद्दा रखते थे। यह उनका जमीनी प्रभाव ही था कि देश के गृहमंत्री अमित शाह को खुद उनसे संवाद स्थापित कर, उन्हें मनाने और संगठन में बनाए रखने के लिए आगे आना पड़ा था।

लेकिन आज पटेरिया के समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह कड़वा सच तैर रहा है कि 25 सालों तक अपनी जवानी और जीवन पार्टी के लिए खपा देने वाले ऐसे निष्ठावान नेताओं को अब ‘इस्तेमाल करो और भूल जाओ’ की रणनीति के तहत दरकिनार कर दिया गया है।

दो नेताओं की पार्टी बनकर रह गई बीजेपी?

राजनीतिक गलियारों में अब यह खुलकर चर्चा होने लगी है कि क्या आज की बीजेपी सामूहिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर होकर केवल दो लोगों (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) की पार्टी बनकर रह गई है?

“जिस पार्टी में कभी आंतरिक लोकतंत्र और हर कार्यकर्ता की सुनवाई की दुहाई दी जाती थी, वहाँ आज केवल दो शीर्ष नेताओं के रणनीतिक समीकरण और चुनावी गणित ही सब कुछ तय करते हैं। चुनावी जीत के अहंकार में अब जमीनी निष्ठा और लंबे समय के योगदान को हाशिए पर धकेल दिया गया है।”

धीरज पटेरिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, एक ही नाव में सवार दो मुसाफिर?

सबसे बड़ा और गंभीर सवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका और उसकी वर्तमान स्थिति को लेकर उठ रहा है। यह वही संघ है जिसने अपने लाखों स्वयंसेवकों की तपस्या के बल पर बीजेपी को शून्य से शिखर तक पहुँचाया, दो सीटों से उठाकर 200 और 300 पार की सत्ता तक का सफर तय कराया। लेकिन आज सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व के मन में संघ के प्रति वो सम्मान और जुड़ाव नजर नहीं आता।

आज धीरज पटेरिया जैसे निष्ठावान नेताओं और खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नियति एक जैसी दिखने लगी है। दोनों को ही सत्ता के गलियारों में उपेक्षित महसूस कराया जा रहा है। सवाल यह है:

  • क्या बीजेपी का वर्तमान नेतृत्व अबराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखना भी पसंद नहीं करता?
  • क्या वैचारिक प्रतिबद्धता पर अब केवल कॉरपोरेट स्टाइल राजनीति हावी हो चुकी है?

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तैयार करेगा एक नई भाजपा‘?

संघ की पृष्ठभूमि हमेशा से जमीनी स्तर की रही है। इतिहास गवाह है कि जब-जब वैचारिक भटकाव आया है, संघ ने बड़े फैसले लिए हैं। अब समय आ गया है जब  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यह तय करना होगा कि क्या वह धीरज पटेरिया जैसे ज़मीन से जुड़े, ईमानदार और जनता के चहेते नेताओं को साथ लेकर आगे बढ़ेगा या फिर सत्ता की इस अनदेखी को सहते हुए खुद भी धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाएगा?

बीजेपी के भीतर बढ़ता यह असंतोष और अच्छे नेताओं की लगातार हो रही अनदेखी, आने वाले समय में एक ‘नई भारतीय जनता पार्टी’ के निर्माण की नींव रख सकती है। यदि  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  ने अपनी जमीनी ताकत को पहचाना और ठान लिया, तो धीरज पटेरिया जैसे कई निष्ठावान नेता न केवल मुख्यधारा में लौटेंगे, बल्कि समाज हित के लिए एक नई और शुद्ध राजनीति का उदय भी करेंगे।

फिलहाल, सत्ता के अहंकार और संगठन की ईमानदारी के बीच छिड़ी यह जंग किस करवट बैठेगी, इस पर पूरे देश और मध्य प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।

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gaurav singh rajput

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