
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में एक बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र में उसके जैविक पिता का नाम दर्ज करने का आदेश दिया है। अदालत ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका को निर्देश दिया कि वह जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज पूर्व पति का नाम हटाकर बच्ची के जैविक पिता का नाम दर्ज करते हुए नया प्रमाणपत्र जारी करे। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी अभिलेखों में वास्तविक तथ्यों का उल्लेख होना चाहिए, ताकि बच्चे की पहचान से जुड़ी किसी भी प्रकार की असंगति न रहे।
जन्म प्रमाणपत्र में पहले पति का नाम दर्ज
जानकारी के अनुसार, महिला की पहली शादी से एक बेटी हुई थी। बाद में पति-पत्नी का तलाक हो गया और बच्ची की अभिरक्षा मां को मिल गई। इसके बाद महिला ने दूसरी शादी की और बच्ची को उसके जैविक पिता ने विधिवत गोद ले लिया। इसके बावजूद जन्म प्रमाणपत्र में पहले पति का नाम दर्ज होने के कारण महिला ने नाम संशोधन के लिए संबंधित प्राधिकरण से अनुरोध किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
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जन्म प्रमाणपत्र केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि यदि कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और उपलब्ध दस्तावेज जैविक पिता के संबंध को प्रमाणित करते हैं, तो जन्म प्रमाणपत्र में सही जानकारी दर्ज की जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जन्म प्रमाणपत्र केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान का महत्वपूर्ण आधार होता है। इसलिए उसमें वास्तविक और प्रमाणित जानकारी का होना आवश्यक है।
सरकारी रिकॉर्ड में संशोधन की आवश्यकता
अदालत ने BMC को निर्देश दिया कि निर्धारित प्रक्रिया पूरी कर बच्ची का संशोधित जन्म प्रमाणपत्र जारी किया जाए। माना जा रहा है कि यह फैसला ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जहां अभिभावकीय स्थिति बदलने या कानूनी गोद लेने के बाद सरकारी रिकॉर्ड में संशोधन की आवश्यकता होती है।
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