
चंदेरी/ रानू परिहार: मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की ऐतिहासिक नगरी चंदेरी सिर्फ अपनी साड़ियों और प्राचीन स्थापत्य के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। यहां का किला इतिहास के उस दौर का गवाह है, जब सत्ता, सामरिक वर्चस्व और स्वाभिमान को लेकर मुगल शासक बाबर और मेदिनीराय खंगार आमने सामने आए थे। जनवरी 1528 में लड़ा गया चंदेरी का युद्ध भारतीय मध्यकालीन इतिहास के महत्वपूर्ण प्रसंगों में गिना जाता है।
किले से जुड़ी स्थानीय परंपराओं में इस युद्ध को राजपूती शौर्य, बलिदान और जौहर की गाथा के रूप में याद किया जाता है। चंदेरी की प्राचीर, दरवाजे और जौहर से जुड़े स्थल आज भी इस इतिहास की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
खानवा के बाद बाबर की नजर चंदेरी पर
1526 में पानीपत के युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराने के बाद बाबर ने दिल्ली और आगरा पर अपना प्रभाव कायम किया। इसके बाद 1527 में खानवा का युद्ध हुआ, जिसमें राणा सांगा के नेतृत्व वाली राजपूत शक्ति को बाबर की सेना से हार का सामना करना पड़ा।
मेदिनीराय खंगार को राणा सांगा का महत्वपूर्ण सहयोगी माना जाता है। चंदेरी उस समय सामरिक दृष्टि से बेहद अहम था। मालवा और बुंदेलखंड के बीच स्थित होने के कारण यहां का किला क्षेत्रीय राजनीति और सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखता था।
खानवा के बाद बाबर ने राजपूत शक्तियों के प्रभाव को कमजोर करने के लिए चंदेरी की ओर रुख किया। दिसंबर 1527 के आसपास बाबर के चंदेरी अभियान की शुरुआत हुई और जनवरी 1528 में उसकी सेना किले के आसपास पहुंच गई।
चंदेरी के बदले शमशाबाद का प्रस्ताव
कहा जाता है कि युद्ध से पहले बाबर ने मेदिनीराय के सामने एक समझौते का प्रस्ताव रखा। बाबर ने चंदेरी के बदले शमशाबाद देने की पेशकश की थी।
लेकिन मेदिनीराय ने चंदेरी छोड़ने से इनकार कर दिया। स्थानीय इतिहास और परंपराओं में इस प्रसंग को मेदिनीराय के स्वाभिमान और चंदेरी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से जोड़कर देखा जाता है।
समझौते की कोशिश नाकाम होने के बाद संघर्ष का रास्ता खुल गया और बाबर की सेना ने चंदेरी पर हमला कर दिया।
जब किले की दीवारों के बीच छिड़ा भीषण युद्ध
जनवरी 1528 के अंतिम दिनों में चंदेरी में निर्णायक संघर्ष हुआ। बाबर की सेना के पास तोपखाने और आधुनिक हथियार थे, जबकि किले के रक्षक राजपूत योद्धा पारंपरिक हथियारों के साथ मुकाबले में उतरे।
युद्ध बेहद भीषण था। स्थानीय इतिहास में बड़ी संख्या में खंगार योद्धाओं के बलिदान का उल्लेख मिलता है। हालांकि अलग-अलग ऐतिहासिक और स्थानीय स्रोतों में मृतकों की संख्या को लेकर भिन्न विवरण मिलते हैं।
चंदेरी किले का एक दरवाजा आज भी स्थानीय रूप से ‘खूनी दरवाजा’ कहलाता है। इससे जुड़ी कई लोककथाएं पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। बरसात के दौरान दीवारों से लाल रंग दिखाई देने की बात भी स्थानीय मान्यता का हिस्सा है, लेकिन इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोकविश्वास के रूप में देखना उचित है।
जौहर की कथा भी चंदेरी के इतिहास का हिस्सा
युद्ध में राजपूत पक्ष की स्थिति कमजोर होने के बाद किले के भीतर महिलाओं द्वारा जौहर किए जाने की कथा भी चंदेरी की ऐतिहासिक स्मृति में प्रमुख स्थान रखती है।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार रानी मणिमाला के नेतृत्व में बड़ी संख्या में क्षत्राणियों ने जौहर किया। जौहर कुंड से जुड़ी यह कहानी आज भी चंदेरी की लोकस्मृति में जीवित है।
माता मणिमाला द्वारा बाबर की ओर तीर चलाए जाने और उसके पगड़ी में तीर लगने की कथा भी स्थानीय लोककथाओं में सुनाई जाती है। हालांकि इस तरह के विवरणों को प्रमाणित इतिहास और लोकपरंपरा के बीच अंतर रखते हुए प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
चंदेरी की प्राचीर आज भी हैं गवाह
चंदेरी का किला कई राजवंशों के उत्थान-पतन का साक्षी रहा है। किले और आसपास के ऐतिहासिक स्थलों में विभिन्न कालखंडों की स्थापत्य परंपराओं की झलक मिलती है। खूनी दरवाजा, जौहर से जुड़ा स्थल और अन्य प्राचीन संरचनाएं चंदेरी के इतिहास को समझने के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
आज चंदेरी सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। यहां आने वाले पर्यटक किले की भव्यता के साथ उन कहानियों से भी रूबरू होते हैं, जिन्होंने इस शहर को इतिहास के पन्नों में खास पहचान दिलाई।
हार के बाद भी इतिहास में अमर हुआ चंदेरी
1528 में बाबर ने चंदेरी पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। सैन्य दृष्टि से यह बाबर की जीत थी, लेकिन मेदिनीराय और चंदेरी के योद्धाओं की कहानी स्थानीय स्मृति में आज भी साहस और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में मौजूद है।
चंदेरी का इतिहास हमें यह भी बताता है कि किसी किले की असली पहचान केवल उसकी ऊंची दीवारों से नहीं होती। उसके भीतर लड़ी गई लड़ाइयां, बलिदान और उनसे जुड़ी लोकस्मृतियां भी उसकी पहचान बनती हैं।
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