लोकतंत्र का गिरता मरुस्थल: जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ

“नमस्कार, मैं हूँ गौरव कुमार संवादाता ब्रांडवानी समाचार से और आज हम बात करेंगे उस भारत की, जिसकी नींव सत्यमेव जयते पर रखी गई थी, लेकिन आज उसी नींव में दरारें स्पष्ट दिखने लगी हैं। क्या हमारा लोकतंत्र वेंटिलेटर पर है? यह सवाल आज इसलिए लाज़मी है क्योंकि देश के दो सबसे मजबूत स्तंभ—न्यायपालिका और पत्रकारिता—आज सत्ता की चौखट पर नतमस्तक नज़र आ रहे हैं। जब कलम बिक जाए और न्याय की तराजू सत्ता के भार से झुक जाए, तो समझ लीजिए कि देश का सामाजिक ताना-बाना बिखरने की कगार पर है।”

कभी ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ कही जाने वाली पत्रकारिता आज ‘चाटुकारिता’ के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। जिन कैमरों को सत्ता से सवाल पूछने थे, वे आज विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने और सरकार की महिमामंडन में लगे हैं।

 जनसरोकार के मुद्दे गायब हैं। बेरोज़गारी और भुखमरी पर बात करने के बजाय, मीडिया ने खुद को सत्ता का ‘प्रवक्ता’ बना लिया है। पत्रकारिता का गिरता स्तर देश को एक ऐसी अंधी गली में ले जा रहा है जहाँ सच को शोर में दबा दिया जाता है।

न्यायपालिका, जिसे आम आदमी का आखिरी भरोसा माना जाता था, आज सवालों के घेरे में है।

जिस तरह से महत्वपूर्ण फैसले प्रभावशाली लोगों के इशारों पर लिए जा रहे हैं, उससे न्याय की निष्पक्षता पर गहरी चोट लगी है। जब ‘तारीख पर तारीख’ सिर्फ आम जनता को मिलती है और ताकतवर लोगों के लिए आधी रात को अदालतें खुलती हैं, तो आम आदमी का भरोसा टूटता है। क्या न्यायपालिका स्वतंत्र है या यह वर्तमान सरकार की नीतिगत शाखा बनकर रह गई है?

वर्तमान सरकार पर आरोप है कि उसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बना दिया है। जब संस्थाएं कमजोर होती हैं, तो समाज में **अपराधिक मानसिकता** और अराजकता बढ़ती है।

देश का सामाजिक विस्तार घट रहा है और ध्रुवीकरण की राजनीति ने आपसी भाईचारे को लील लिया है। विकास के दावों के बीच, नैतिक पतन का ग्राफ तेज़ी से ऊपर जा रहा है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब पत्रकारिता बिकी है और न्यायपालिका झुकी है, तब-तब तानाशाही ने जन्म लिया है। आज ज़रूरत है कि हम आईने में अपनी सूरत देखें। क्या हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर रहे हैं जहाँ सच बोलना अपराध हो और चाटुकारिता ही योग्यता बन जाए? जागिए, इससे पहले कि लोकतंत्र की यह लौ पूरी तरह बुझ जाए।

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Gaurav Singh

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