
वर्तमान समय में जब सरकार ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ पर ज़ोर दे रही है, भारतीय व्यवसायों के लिए छुपा हुआ अनुपालन भार (Hidden Compliance Burden) सबसे बड़ा बाधक बनकर उभरा है। एक वित्तीय विशेषज्ञ के नाते मैं रोज़ देखता हूँ कि जीएसटी, आयकर, कंपनी कानून और श्रम कानून से जुड़े नियमों की जटिलता ने व्यापार में लागत और जोखिम दोनों को बढ़ा दिया है।
व्यावहारिक उदाहरण लें एक साधारण मैन्युफैक्चरिंग SME को हर साल दर्जनों जीएसटी रिटर्न, TDS/ TCS स्टेटमेंट्स, ROC फाइलिंग्स, और श्रम कानून के पोर्टल्स पर अलग-अलग दस्तावेज़ जमा करने पड़ते हैं। EY की रिपोर्ट के मुताबिक औसत रूप से अनुपालन लागत कुल कारोबार का 5-7% तक छू जाती है। MSMEs के लिए यह अनुपात और भी अधिक है, क्योंकि उनके पास न तो विशेषज्ञ स्टाफ होता है, न महंगे सलाहकारों की पहुँच। नतीजतन, वे छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों के लिए दंड, ब्याज या नोटिस झेलते हैं।
सरकार ने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और ई-गवर्नेंस की दिशा में कई अच्छे कदम उठाए हैं, जैसे GSTN पोर्टल, ई-इनवॉइसिंग, फेसलेस असेसमेंट आदि। इससे पारदर्शिता और डेटा एनालिटिक्स को बल मिला है। परंतु बार-बार बदलते नियम, पोर्टल की तकनीकी दिक्कतें और अस्पष्ट दिशानिर्देशों ने अनुपालन को सरल बनने नहीं दिया। World Bank की ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट में भी ‘टैक्स पेमेंट्स’ कैटेगरी में भारत की रैंकिंग औसत ही रही है।
इसका असर व्यापक है छोटे व्यवसाय अक्सर “शेडो इकोनॉमी” में चले जाते हैं, जिससे सरकार का टैक्स बेस कम रहता है और आम करदाता पर अप्रत्यक्ष भार बढ़ता है। वहीं, व्यवसायी अपने मुख्य काम से ज्यादा समय और पैसा केवल अनुपालन में झोंकने को मजबूर हैं।
राह क्या है? पहली ज़रूरत है एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म, जहाँ GST, आयकर, श्रम, ROC सबकी फाइलिंग एक ही जगह हो सके। MSMEs के लिए सरल, प्री-फिल्ड फॉर्म्स और न्यूनतम दस्तावेज़ीकरण जरूरी है। पोर्टल्स पर 24×7 सपोर्ट और स्थानीय भाषा में गाइडेंस भी मिले। सबसे महत्वपूर्ण नीतियों में बार-बार बदलाव की बजाय स्थिरता लाई जाए, ताकि व्यवसायी प्लानिंग कर सकें।
संक्षेप में, अनुपालन प्रक्रिया का सरलीकरण और पारदर्शिता ही भारत के व्यवसायों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकाऊ बना सकती है। जब तक छुपा अनुपालन भार नहीं घटेगा, तब तक ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ एक अधूरी कल्पना ही रहेगी।









