
देश में एक बार फिर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़ों को लेकर घमासान छिड़ गया है। केंद्र सरकार जहां पहली तिमाही में 7.8% की तेज आर्थिक विकास दर का दावा कर दुनिया में सबसे तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था का ढोल पीट रही है, वहीं शीर्ष अर्थशास्त्रियों और पूर्व नीति-निर्माताओं ने इन आंकड़ों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि हेडलाइन मैनेजमेंट और आंकड़ों की बाजीगरी के जरिए जमीनी सच पर पर्दा डाला जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के विश्लेषण ने खड़ा किया है। गर्ग के मुताबिक, सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) द्वारा पिछले वर्षों के बेस डेटा में किए गए संशोधनों के कारण इस साल का प्रतिशत उछलकर 7.8% दिखाई दे रहा है। यदि इन सांख्यिकीय बदलावों और काट-छांट को हटाकर वास्तविक उत्पादन का आकलन किया जाए, तो देश की असल आर्थिक बढ़त महज़ 2.6% के आसपास ठहरती है।
यह चिंता इसलिए भी गहरी है क्योंकि सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे डॉ. अरविंद सुब्रमण्यम भी पहले यह स्थापित कर चुके हैं कि डिफ्लेटर और गणना पद्धति की विसंगतियों के कारण भारत की जीडीपी लगातार करीब 2% से 2.5% अधिक आंकी जाती रही है। जब कच्चे माल की महंगाई और थोक सूचकांकों का सही संतुलन नहीं बैठता, तो कागजों पर विकास दर कई गुना चमकने लगती है।
कागजी आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत का यह अंतर आम जनता की जेब में साफ देखा जा सकता है। जिस दौर में 7.8% की ऐतिहासिक छलांग का दावा किया जा रहा है, उसी समय देश में युवाओं की बेरोजगारी दर चिंताजनक स्तर पर बनी हुई है। ग्रामीण खपत में ठहराव है और आम परिवारों द्वारा घर का सोना गिरवी रखकर गोल्ड लोन लेने के मामलों में भारी उछाल आया है। यदि अर्थव्यवस्था सचमुच रिकॉर्ड रफ्तार से दौड़ रही है, तो आम नागरिक की आमदनी क्यों नहीं बढ़ रही और 80 करोड़ लोग मुफ्त अनाज की कतार में क्यों खड़े हैं?
ब्रैंडवाणी समाचार का मानना है कि बेस ईयर और गणना के तरीके बदलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वाहवाही तो लूटी जा सकती है, लेकिन यह सांख्यिकी महंगाई से जूझती जनता को राहत नहीं दे सकती। देश को खोखले आंकड़ों के जश्न से ज्यादा ठोस रोजगार और पारदर्शी नीतियों की दरकार है।
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